अमोघ कल्याणकारी तिथि है पितृ अमावस्या

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डॉ राकेश कुमार सिन्हा ‘रवि’

अध्यात्म लेखक

पितरों की स्मृति का सालाना धार्मिक समागम पितृपक्ष में ऐसे तो सभी दिन महत्वपूर्ण माने जाते हैं, पर इनमें अंतिम दिन अर्थात् अमावस्या की तिथि को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है. इससे महालया, पितृ अमावस्या और पितृ विसर्जन अमावस्या के नाम से भी जानते हैं. अश्विन की अमावस्या को पितृ विसर्जन का सनातन धर्म में विशेष महत्व है. जो लोग पितृपक्ष के विशेष दिनों में तर्पण, पिंड आदि का कार्य नहीं कर पाते, वे अमावस्या को ही अपने पितरों की निमित्त पिंड व तर्पण कार्य संपन्न करते हैं. ऐसे भी जिन पितरों की तिथि याद नहीं है, उनके निमित्त श्राद्ध-पिंडदान और तर्पण कार्य इसी अमावस्या को करना सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है. जानकार विद्वान राघवाचार्य स्वामी जी कहते हैं, जो जहां भी श्राद्ध पिंडदान कर रहे हों, उनकी पूर्णाहुति पितृ अमावस्या के दिन ही किया जाना शास्त्र सम्मत है. कहते हैं आज के दिन पितर लोग जाने के पूर्व श्राद्ध, पिंड व जल की आशा में रहते हैं और जहां से उन्हें ये सब चीज नहीं मिलतीं, उन्हें श्राप देकर चले जाते हैं. वहीं अगर उनके संतति पिंड और जल तर्पण करते हैं, तो उन्हें आशीर्वाद देकर ही वे जाते हैं.

पितृपक्ष के इस पावन भाव दिवस में शक्ति व सामर्थ्य की अनुरूप दान व ब्राह्मण भोज आदि का विशेष महत्व होता है. उस पर भी षोडशदान अथवा दशदान का अपना अलग महत्व है. हिंदू धर्म में मानव जीवन का एक विशेष संस्कार है श्राद्ध, जिसे प्राचीन काल में ब्रह्मा के पुत्र महर्षि अत्रि और उन्हीं के वंशज में भगवान दत्तात्रेय जी द्वारा इस क्रिया-कर्म को बढ़ाया गया. दत्तात्रेय जी के पुत्र निमि हुए और निमि के पुत्र श्रीमान् हुए. श्रीमान् बहुत ही सुंदर थे पर कठोर तपस्या के बाद उनकी मृत्यु होने पर महर्षि को बहुत दु:ख हुआ. तब उन्होंने अपने पुत्र के लिए शास्त्र विधि के अनुसार सूतक निवारण के नाम सारी क्रियाएं कीं, फिर चतुर्दशी के दिन श्राद्ध कर दी और अंत में उनका विधिवत रूप से पिंड अर्पण किया. यही बाद में पितृ पर्व के रूप में स्थापित हुआ, जिसको आगे बढ़ाने में कश्यप मुनि के भी अभिन्न योगदान को इंकार नहीं किया जा सकता. विवरण है कि पितरों की मुक्ति से मनुष्य को पुष्टि, आयु, संतति, सौभाग्य, समृद्धि, कामना पूर्ति, वाक्य सिद्धि, विद्या तथा सभी सुखों की प्राप्ति होती है.

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