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गरबा नाइट में डांडिया नृत्य के दौरान छात्राएं
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
बिहार के औरंगाबाद में शारदीय नवरात्र के मौके पर इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों ने प्राचीनता का नवीनता से मिश्रण किया है। मिश्रण से बना बिहार का देसी गरबा और गुजराती डांडिया नृत्य का रिमिक्स बेहद शानदार रहा। इस रिमिक्स डांस पर विद्यार्थियों ने जमकर मस्ती की। अवसर था बिहार के औरंगाबाद में रफीगंज के अरथुआ स्थित राजकीय अभियंत्रण महाविद्यालय में दुर्गा पूजा के अवसर आयोजित गरबा नाइट का।
झिझिया विद डांडिया की मिक्सिंग पर डांस मस्ती
इसी गरबा नाइट में इंजीनियरिंग विद्यार्थियों ने बिहार के देसी गरबा को डांडिया के साथ मिक्स किया। मिक्सिंग शानदार रही और इसका उद्देश्य भी पूरा हुआ और इस बहाने स्टूडेंट्स नवरात्र में मिथिला में प्रस्तुत की जाने वाली विलुप्त होती लोक नृत्य ‘झिझिया’ की परंपरा को पुनर्जीवित करने का संदेश देने में सफल रहे। इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत मां की आरती के साथ की गई। इसके बाद कॉलेज की छात्रा सुरभि, आकांक्षा, अंजलि, साक्षी और निशा ने झिझिया लोक नृत्य की प्रस्तुति दी। बाद में डांडिया की भी प्रस्तुति हुई, जिसमें झिझिया भी मिक्स हो गया। डांडिया और झिझिया दोनों पर ही स्टूडेंट्स ने जमकर डांस मस्ती की। इस दौरान महाविद्यालय के अध्यापक गण भी मौजूद रहे।
प्रिंसिपल की प्रेरणा पर स्टूडेंट्स ने की झिझिया-डांडिया मिक्सिंग
इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रशांत मणि ने कहा कि वे उत्तर प्रदेश से हैं। प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं में भी वे रुचि रखते हैं। शारदीय नवरात्र पर जब कॉलेज में स्टूडेंट्स ने ‘गरबा’ की बात की तो उन्होंने उन्हें इसमें बिहार के देसी गरबा ‘झिझिया’ को मिक्स करने का सुझाव दिया। स्टूडेंट्स मान गए। फिर क्या झिझिया विद डांडिया का स्टूडेंट्स ने ऐसा डांस किया कि टीचर्स भी मस्ती में झूमने से खुद को रोक नहीं सके। युवा अध्यापकों ने भी डांस और मस्ती की।
उन्होंने कहा कि पर्व त्योहार और उत्सव हमारे पारंपरिक विरासत और रीति-रिवाजों को प्रदर्शित करने का अवसर उपलब्ध कराते हैं। ऐसे अवसर का इस्तेमाल हमारे स्टूडेंट्स ने विलुप्त होती ‘झिझिया’ को बचाने और संरक्षित रखने का संदेश देने में किया, जो सराहनीय है। कॉलेज के कैंपस इंचार्ज डॉ. सचिन माहेश्वर ने बताया कि कार्यक्रम को छात्रों ने काफी अनुशासित तरीके से संचालित किया।
मिथिला का प्राचीन व प्रमुख लोक नृत्य है ‘झिझिया‘
‘झीझिया’ मिथिला का एक प्रमुख प्राचीन सांस्कृतिक लोक नृत्य है। दुर्गा पूजा के मौके पर इस नृत्य में लड़कियां बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं। इस नृत्य में कुवारीं लड़कियां अपने सिर पर जलते दिए और छिद्र वाले घड़ों को लेकर नाचती हैं। नृत्य करते समय वे इसे संतुलित रखती हैं। यह नृत्य राजा चित्रसेन और उनकी रानी के प्रेम-प्रसंगों पर आधारित है। झिझिया ज्यादातर दुर्गा भैरवी, जो विजय की देवी हैं। उनके समर्पण में दशहरा के समय किया जाने वाला नृत्य है।
उपेक्षा का शिकार हुआ ‘झिझिया‘
पूर्व में मिथिला के कोने-कोने में झिझिया नृत्य का आयोजन किया जाता था। पौराणिक काल से नवरात्र के समय प्रस्तुत की जाने वाली यह नृत्य कला अब उपेक्षा का शिकार होकर विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। पहले हर गांव से झिझिया नृत्यकर्ताओं की टोली नवरात्रि के दौरान निकलती थी। अब तो कहीं-कहीं ही इस नृत्य का अस्तित्व बचा हुआ है। इस लोक नृत्य के विलुप्त होने का एक कारण प्रशासनिक उदासीनता भी है।
ऐसे किया जाता है ‘झिझिया‘ नृत्य
दुर्गा पूजा के मौके पर लड़कियां ‘झीझिया’ नृत्य में बढ़-चढ़ कर भाग लेती हैं। इस नृत्य में कुंवारी लड़कियां और महिलाएं अपने सिर पर छिद्र वाले घड़े में जलते दीए रखकर नाचती हैं। इस नृत्य का आयोजन शारदीय नवरात्र में किया जाता है। महिलाएं अपनी सहेलियों के साथ गोल घेरा बनाकर गीत गाते हुए नृत्य करती हैं। घेरे के बीच एक मुख्य नर्तकी रहती हैं। मुख्य नर्तकी सहित सभी नृत्य करने वाली महिलाओं के सिर पर सैकड़ों छिद्रवाले घड़े होते हैं, जिनके भीतर दीप जलता रहता है। घड़े के उपर ढक्कन पर भी एक दीप जलता रहता है। इस नृत्य में सभी के एक साथ ताली वादन और पग-चालन तथा थिरकने से जो समां बंधता है, वह अत्यंत ही आकर्षक होता है। सिर पर रखे दीप युक्त घड़े का बिना हाथ का सहारा लिए महिलाएं एक-दूसरे से सामंजस्य स्थापित कर नृत्य का प्रदर्शन करती हैं।
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