जम्मू-कश्मीर: हाईकोर्ट ने मियां कयूम समेत कश्मीर के तीन अधिवक्ताओं को जारी किया नोटिस, जानें क्या है मामला

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highcourt srinagar

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– फोटो : फाइल

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जम्मू-कश्मीर व लद्दाख हाईकोर्ट की अनुशासन समिति ने तीन अधिवक्ताओं मियां अब्दुल कयूम, नजीर रोंगा व गुलाम नबी ठोकर को नोटिस जारी किया है। अधिवक्ता अधिनियम 1961 के तहत प्रोफेशनल व अन्य कदाचार करने के आरोप में नोटिस जारी कर 17 दिसंबर तक जवाब देने को कहा है। नोटिस में कहा गया है कि प्रथम दृष्टया कयूम व अन्य दो पर लगाए गए आरोप व्यावसायिक कदाचार की श्रेणी में आते हैं। 

कानून लागू कराने वाली एजेंसियों की जांच के आधार पर कयूम समेत तीन अधिवक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए कानून विभाग के सचिव अचल सेठी ने शिकायत दर्ज कराई थी। इस पर जज संजीव कुमार ने 17 दिसंबर या उससे पहले जवाब देने को कहा है। साथ ही शिकायतकर्ता तथा महाधिवक्ता को भी उपस्थित होने को कहा है। 

सूत्रों के अनुसार जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि मियां अब्दुल कयूम देश विरोधी और अलगाववादी विचारधारा के लिए जाना जाता है। वह पूरी कश्मीर घाटी में हड़ताल की कॉल और धरना-प्रदर्शन में मुख्य भूमिका निभाता रहा है। 1990 में वह खुलकर अलगाववादी आंदोलन के समर्थन में आया और यूएन मुख्यालय श्रीनगर में ज्ञापन सौंपा। 

वह आल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस से हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को संबद्ध कराने के लिए जिम्मेदार रहा है। बार एसोसिएशन के संविधान की प्रस्तावना भी तैयार की, जिससे जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग किया जा सके। कोट भलवाल जेल के अधीक्षक के खिलाफ अवमानना के एक मामले में सात अप्रैल 2010 को उसने हाईकोर्ट श्रीनगर में बयान दिया था कि वह भारत के संविधान को नहीं मानता। 

अप्रैल 2005 में उसने आतंकियों का खुलेआम समर्थन करते हुए कहा था कि आजादी हासिल होने तक सशस्त्र संघर्ष जारी रहेगा। मोहम्मद अली जिन्ना का जन्मदिन मनाने के लिए मुस्लिम लीग की ओर से दिसंबर 2007 में आयोजित कैद-ए-आजम सेमिनार में शामिल हुआ। जून 2008 में कयूम ने अमरनाथ भूमि आंदोलन के दौरान लोगों को भड़काने का काम किया। अक्तूबर 2008 में आजादी के समर्थन में नारे लगाते हुए लाल चौक तक मार्च निकाला। मार्च 2009 में कहा था कि कुपवाड़ा में जान देने वाले 18 मुजाहिदीन पर कश्मीरी जनता को गर्व है। 

मुफ्त कानूनी सहायता के नाम पर आतंकियों-पत्थरबाजों के केस की पैरवी

मियां कयूम व जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन मुफ्त न्यायिक सहायता के नाम पर आतंकियों व पत्थरबाजों के मुकदमों की पैरवी करती थी। कयूम दावा करता था कि न्यायिक सहायता मुफ्त में दी जाती है, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि वह पाकिस्तान और आतंकी संगठनों से केस लड़ने के लिए पैसे लेता था। लीगल सेल को पाकिस्तान की आईएसआई फंड उपलब्ध कराती थी। वह और शफाकत हुसैन समेत कई वकील केस लड़ते थे और 1990 के बाद आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़े सभी मामलों में अपने अनुकूल फैसला करा लेते थे। 

ठोकर व मोंगा पर भी इसी तरह के आरोप

गुलाम नबी ठोकर उर्फ शाहीन ने फरवरी 2009 में एक सेमिनार में कहा था कि अलगाववादी नेता अपने मतभेदों को खत्म कर एक मंच पर आएं ताकि एकजुट होकर जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग किया जा सके। नजीर मोंगा भी खुलेआम आतंकियों का समर्थन करता था। 2008 के अमरनाथ भूमि आंदोलन के दौरान भी वह लोगों को भड़काता था। साथ ही हड़ताल के दौरान काम पर आने वाले अधिवक्ताओं को धमकी देता था। 

विस्तार

जम्मू-कश्मीर व लद्दाख हाईकोर्ट की अनुशासन समिति ने तीन अधिवक्ताओं मियां अब्दुल कयूम, नजीर रोंगा व गुलाम नबी ठोकर को नोटिस जारी किया है। अधिवक्ता अधिनियम 1961 के तहत प्रोफेशनल व अन्य कदाचार करने के आरोप में नोटिस जारी कर 17 दिसंबर तक जवाब देने को कहा है। नोटिस में कहा गया है कि प्रथम दृष्टया कयूम व अन्य दो पर लगाए गए आरोप व्यावसायिक कदाचार की श्रेणी में आते हैं। 

कानून लागू कराने वाली एजेंसियों की जांच के आधार पर कयूम समेत तीन अधिवक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए कानून विभाग के सचिव अचल सेठी ने शिकायत दर्ज कराई थी। इस पर जज संजीव कुमार ने 17 दिसंबर या उससे पहले जवाब देने को कहा है। साथ ही शिकायतकर्ता तथा महाधिवक्ता को भी उपस्थित होने को कहा है। 

सूत्रों के अनुसार जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि मियां अब्दुल कयूम देश विरोधी और अलगाववादी विचारधारा के लिए जाना जाता है। वह पूरी कश्मीर घाटी में हड़ताल की कॉल और धरना-प्रदर्शन में मुख्य भूमिका निभाता रहा है। 1990 में वह खुलकर अलगाववादी आंदोलन के समर्थन में आया और यूएन मुख्यालय श्रीनगर में ज्ञापन सौंपा। 

वह आल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस से हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को संबद्ध कराने के लिए जिम्मेदार रहा है। बार एसोसिएशन के संविधान की प्रस्तावना भी तैयार की, जिससे जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग किया जा सके। कोट भलवाल जेल के अधीक्षक के खिलाफ अवमानना के एक मामले में सात अप्रैल 2010 को उसने हाईकोर्ट श्रीनगर में बयान दिया था कि वह भारत के संविधान को नहीं मानता। 

अप्रैल 2005 में उसने आतंकियों का खुलेआम समर्थन करते हुए कहा था कि आजादी हासिल होने तक सशस्त्र संघर्ष जारी रहेगा। मोहम्मद अली जिन्ना का जन्मदिन मनाने के लिए मुस्लिम लीग की ओर से दिसंबर 2007 में आयोजित कैद-ए-आजम सेमिनार में शामिल हुआ। जून 2008 में कयूम ने अमरनाथ भूमि आंदोलन के दौरान लोगों को भड़काने का काम किया। अक्तूबर 2008 में आजादी के समर्थन में नारे लगाते हुए लाल चौक तक मार्च निकाला। मार्च 2009 में कहा था कि कुपवाड़ा में जान देने वाले 18 मुजाहिदीन पर कश्मीरी जनता को गर्व है। 

मुफ्त कानूनी सहायता के नाम पर आतंकियों-पत्थरबाजों के केस की पैरवी

मियां कयूम व जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन मुफ्त न्यायिक सहायता के नाम पर आतंकियों व पत्थरबाजों के मुकदमों की पैरवी करती थी। कयूम दावा करता था कि न्यायिक सहायता मुफ्त में दी जाती है, लेकिन रिपोर्ट बताती है कि वह पाकिस्तान और आतंकी संगठनों से केस लड़ने के लिए पैसे लेता था। लीगल सेल को पाकिस्तान की आईएसआई फंड उपलब्ध कराती थी। वह और शफाकत हुसैन समेत कई वकील केस लड़ते थे और 1990 के बाद आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़े सभी मामलों में अपने अनुकूल फैसला करा लेते थे। 

ठोकर व मोंगा पर भी इसी तरह के आरोप

गुलाम नबी ठोकर उर्फ शाहीन ने फरवरी 2009 में एक सेमिनार में कहा था कि अलगाववादी नेता अपने मतभेदों को खत्म कर एक मंच पर आएं ताकि एकजुट होकर जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग किया जा सके। नजीर मोंगा भी खुलेआम आतंकियों का समर्थन करता था। 2008 के अमरनाथ भूमि आंदोलन के दौरान भी वह लोगों को भड़काता था। साथ ही हड़ताल के दौरान काम पर आने वाले अधिवक्ताओं को धमकी देता था। 



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