Bihar: नीतीश के जरिए BJP ने बिगाड़ी विपक्षी गठबंधन की सोशल इंजीनियरिंग, एम-वाई वोट बैंक में सेंध लगाना चुनौती

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Bihar: BJP spoiled the social engineering of opposition alliance through Nitish kumar

Bihar: MP CM Mohan Yadav
– फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

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लोकसभा चुनाव से पहले बिहार में हुए एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के तहत जेडीयू प्रमुख नीतीश कुमार, इंडिया गठबंधन छोड़कर भाजपा के पाले में आ गए हैं। उन्होंने नौवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। उनकी सरकार में भाजपा भी शामिल हो गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा ने नीतीश कुमार को साथ लेकर, विपक्षी गठबंधन की सोशल इंजीनियरिंग को काफी हद तक नुकसान पहुंचा दिया है। अब राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के पास, यादव व मुस्लिम समुदाय बचा है। इन समुदायों पर विपक्षी गठबंधन का बड़ा प्रभाव है। भाजपा के लिए इस वोट बैंक में सेंध लगाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। जातिगत जनगणनना के नतीजों के बाद राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस पार्टी, उक्त दोनों समुदायों को अपना मानकर चल रहे हैं।

बिहार में जातिगत जनगणना के परिणामों को राष्ट्रीय जनता दल, जेडीयू और कांग्रेस पार्टी सहित कई छोटे दल, सियासत में अपने लिए फायदे के तौर पर देख रहे हैं। इन दलों की सोच है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उन्हें जातिगत जनगणना का फायदा मिलेगा। नीतीश कुमार ने इस मामले में आरक्षण का दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव पास कर दिया। उसके बाद से ही यह मांग की जाने लगी कि केंद्र सरकार, बिहार में आरक्षण के बढ़े हुए दायरे को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करे। जातिगत जनगणना की रिपोर्ट में सामने आया था कि बिहार में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) की आबादी सबसे ज्यादा 36 फीसदी है। इसके बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का नंबर आता है। इस समुदाय की आबादी 27.12 फीसदी है।

अनुसूचित जाति की बात करें, तो इस समुदाय की संख्या करीब 19.65 फीसदी है। अनुसूचित जनजाति समुदाय की आबादी डेढ़ फीसदी है। बिहार में सामान्य जाति की आबादी 15.52 फीसदी है। ब्राह्मण 3.67 फीसदी, राजपूत 3.45 फीसदी, भूमिहार 2.89 फीसदी, कायस्थ 0.60 फीसदी, यादव 14.26 फीसदी, कुशवाहा 4.27 फीसदी, कुर्मी 2.87 फीसदी, तेली 2.81 फीसदी, मुसहर 3.08 फीसदी, सोनार 0.68 फीसदी, मल्लाह 2.60 फीसदी, बढ़ई 1.4 फीसदी, कुम्हार 1.4 फीसदी, पासी 0.9 फीसदी, धोबी 0.8 फीसदी और मोची, चमार व रविदास जाति के लोगों की आबादी 5.2 फीसदी है। इसमें से अगर हिंदू आबादी की बात करें, तो वह 81.99 फीसदी है। मुस्लिम आबादी 17.70 फीसदी है। ईसाई .05, सिख .01 और बौद्ध आबादी .08 फीसदी है।

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस, यादव व मुस्लिमों को अपने पक्ष में मान रही है। इन दोनों समुदायों की आबादी यानी 17.70 फीसदी मुस्लिम और 14.26 फीसदी यादव को जोड़ें, तो वह संख्या करीब 32 फीसदी हो जाती है। यदि इस आबादी के वोट चुनाव में विभाजित नहीं होते हैं, तो राजद व कांग्रेस को इसका लाभ मिल सकता है। भाजपा का प्रयास है कि नीतीश कुमार की जेडीयू, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और जीतन राम मांझी की पार्टी ‘हम’ के माध्यम से हिंदू आबादी, जिसकी संख्या 81 फीसदी है, इसके एक बड़े हिस्से को अपने पक्ष में किया जाए। हालांकि भाजपा ने यादव समुदाय के वोट बैंक में सेंध लगाने की योजना बनाई है। इसके लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को जिम्मेदारी सौंपी गई है। वे बिहार के यादवों को भाजपा के पक्ष में लाने का प्रयास करेंगे। अगर भाजपा को इस वोट बैंक में सेंध लगाने में सफलता मिलती है, तो लोकसभा चुनाव में एनडीए को बहुमत हासिल हो सकता है।

ये सब इतना आसान भी नहीं है, पूर्व डिप्टी सीएम और राजद नेता तेजस्वी यादव कह चुके हैं कि बिहार में अभी खेला बाकी है। इससे पहले भी यादव ने युवाओं को जॉब के मुद्दे पर अपने पाले में करने का प्रयास किया है। केंद्र सरकार ने जब कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा की तो राजद नेताओं ने दावा किया था कि यह तो उनकी मांग रही है। बिहार में हुई जाति आधारित गणना के बाद ही केंद्र सरकार ने यह फैसला लिया है। इसके पीछे राजद का दबाव रहा है। इतना ही नहीं, राजद नेताओं ने यह भी कह दिया कि भाजपा खुद को सही मायने में पिछड़े वर्गों की हितैषी मानती है, तो उसे बिहार में जाति आधारित गणना के बाद बढ़ाए गए आरक्षण के दायरे को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कर देना चाहिए। राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कह दिया, अब हमारी मांग है कि केंद्र सरकार, बिहार में आरक्षण के बढ़े हुए दायरे को संविधान की 9वीं अनुसूची में शामिल करे। कर्पूरी ठाकुर के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अन्यथा उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा सांकेतिक लगेगी।

भाजपा ने 2014 के आम चुनाव में बिहार के ईबीसी वोट पर अच्छी खासी पकड़ बनाई थी। उसके बाद से भाजपा ने ईबीसी समुदाय की एक बड़ी संख्या को अपने से अलग नहीं होने दिया। पिछला लोकसभा चुनाव भाजपा और जेडीयू ने मिलकर लड़ा था। लोकसभा की 40 में 39 सीटों पर एनडीए ने जीत दर्ज की थी। अब जातिगत जनगणनना के बाद वहां के राजनीतिक समीकरण बदले हैं। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस, राजद और वाम दल को अपनी प्रभावशाली भूमिका नजर आ रही है। ये दल ईबीसी वोटों पर अपना दबदबा बढ़ाने में लगे हैं। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि नीतीश कुमार के साथ आने से उन्हें ईबीसी व दूसरे समुदायों का भरपूर समर्थन मिलेगा। भाजपा इस पहलू से भलीभांति अवगत है कि ईबीसी, ओबीसी और एससी-एसटी का बढ़ा हुआ आरक्षण, कहीं उसे नुकसान न पहुंचा दे। भाजपा इसके लिए अपने आक्रामक हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।






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