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उम्मीदों का बजट।
– फोटो : अमर उजाला
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हिमाचल में शैक्षणिक सत्र के बीच में शिक्षकों के तबादले और सेवानिवृत्ति ना किए जाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। स्कूल-कॉलेजों में गुणात्मक शिक्षा देने के लिए इन दोनों प्रक्रियाओं पर मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के बजट भाषण में रोक लगाने की घोषणा होने की आस है। पूरे साल तबादले और सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया चलने से संस्थानों में पढ़ाई प्रभावित होती है। ऐसे में अभिभावकों का मत है कि इसको लेकर सरकार समय रहते कोई बड़ा फैसला ले। नया सत्र शुरू होने से पहले ही शिक्षकों के तबादले और सेवानिवृत्ति की जानी चाहिए। विश्वविद्यालयों में सेवानिवृत्ति साल में सिर्फ एक बार की जाती है। इसी तर्ज पर स्कूल और कॉलेजों में फैसला किए जाने की उम्मीद है।
स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों के रिक्त पद भरने के लिए शिक्षित बेरोजगार नई भर्तियों की घोषणा होने के इंतजार में हैं। स्कूलों में विभिन्न श्रेणियों के शिक्षकों के हजारों पद रिक्त हैं। कॉलेजों में भी असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती होने का सेट व नेट पास कर चुके युवा इंतजार कर रहे हैं। सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों के नामांकन कम होने के लिए शिक्षकों की कमी भी बड़ा कारण है। शिक्षा विभाग की ओर से विभिन्न स्वतंत्र एजेंसियों के माध्यम से करवाए जाने वाले सर्वे में भी यह कारण सामने आया है। केंद्र सरकार से विभिन्न योजनाओं में फंडिंग को राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करना भी जरूरी है।
पूर्व सरकार के समय हिमाचल प्रदेश में देश में सबसे पहले शिक्षा नीति को लागू करने का दावा किया गया था लेकिन नीति को गंभीरता से लागू करने में अब हिमाचल प्रदेश पिछड़ गया है। हालांकि प्रदेश सरकार ने शिक्षा नीति को लागू करने के लिए कई कमेटियों का गठन किया हुआ है, लेकिन नीति लागू करने के लिए अभी धरातल पर कोई विशेष कार्य नहीं दिख रहा है। प्रदेश सरकार को इस बाबत कार्य करना चाहिए। नीति लागू करने के लिए समय तय करना जरूरी हो गया है। अगर समय रहते नीति को लागू नहीं किया गया तो भारत सरकार की ओर से प्रदेश को शिक्षा के क्षेत्र में दी जाने वाली विभिन्न योजनाओं की फंडिंग बंद भी हो सकती है।
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