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Mukhtar Ansari
– फोटो : अमर उजाला
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गाजीपुर के फर्जी शस्त्र लाइसेंस मामले में माफिया मुख्तार अंसारी को सजा दिलाने में आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की गवाही महत्वपूर्ण रही है। तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक रंजन यूपी के मुख्य सचिव बनकर सेवानिवृत्त हुए, लेकिन अदालत में उपस्थित होकर गवाही दी।
इसी तरह गाजीपुर के तत्कालीन एसपी देवराज नागर यूपी के डीजीपी बने और सेवानिवृत्त हो गए। उन्होंने भी गवाही दी। वाराणसी की अदालत भी आए। अदालत ने अपने आदेश में आला अफसरों की गवाही और उनके तर्क का हवाला भी दिया है। अदालत ने कहा कि आला अफसरों के फर्जी हस्ताक्षर बनाना और उसपर शस्त्र लाइसेंस लेना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
गाजीपुर तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक रंजन ने कहा कि वर्ष 1985-86-87 में जिलाधिकारी पद पर तैनात था। उस दौरान मुख्तार अंसारी, रामबहादुर सिंह, अब्दुल वजीद, सैय्यद मुहम्मद इजराइल आदि के शस्त्र लाइसेंस स्वीकृत नहीं किए थे। हस्ताक्षर मेरे नहीं थे। किसी ने षडयंत्र और धोखाधड़ी करके फर्जी ढंग से बनाए हैं। घटना के बाबत विवेचक ने मेरा बयान लिया था।
गाजीपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक देवराज नागर ने कहा कि 1986-87 तक गाजीपुर में पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त था। मुख्तार के शस्त्र लाइसेंस पर मेरा कूटरचित हस्ताक्षर बनाया गया था। मुख्तार के शस्त्र लाइसेंस के आवेदन पत्र पर कोई हस्ताक्षर नहीं किया था। सीबीसीआईडी के विवेचक ने मेरा बयान लिया था।
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