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वीके सक्सेना, उपराज्यपाल दिल्ली।
– फोटो : social media
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राजधानी दिल्ली में बिजली सब्सिडी के मामले में संज्ञान लेते हुए उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने मुख्य सचिव को दिल्ली बिजली नियायक आयोग (डीईआरसी) की वैधानिक सलाह के पालन के लिए इसे मंत्रिपरिषद के समक्ष रखते हुए 15 दिनों के भीतर निर्णय लेने को कहा है। मुख्यमंत्री को तत्कालीन ऊर्जा मंत्री की तरफ से व्यापार नियमों (टीओबीआर) की मिली खामियां बताते हुए मुख्यमंत्री से दिल्ली सरकार के सभी मंत्रियों से व्यापार नियमों का ईमानदारी से पालन करने का निर्देश देने का भी आग्रह किया है। आयोग की सलाह को लागू करने से 91-95 फीसदी उपभोक्ताओं को राहत मिलने के साथ ही सरकारी खजाने में 316 करोड़ रुपये तक की सालाना बचत होती।
आम आदमी पार्टी सरकार को डीईआरसी ने 2020 में एक वैधानिक सलाह जारी करते हुए दिल्ली सरकार से आर्थिक तौर पर कमजोर और जरूरतमंद उपभोक्ताओं तक बिजली सब्सिडी को सीमित रखने के लिए विचार करने को कहा था। इससे 1-5 किलोवाट बिजली की खपत करने वालों को सब्सिडी का 95 फीसदी लोगों को फायदा मिलता। साथ ही गैर जरूरी उपभोक्ताओं को जिनकी खपत अधिक है, उस मद में सालाना 200-316 करोड़ रुपये की सरकारी खजाने में बचत हो सकती थी।
डीईआरसी की सलाह को दरकिनार करते हुए बिजली विभाग व्यापार नियमों का उल्लंघन कर रहा है। कैबिनेट की बगैर मंजूरी बिजली सब्सिडी योजना को जारी रखा गया। इसके लिए वित्तीय स्वीकृति नहीं होने से 316 करोड़ का बोझ बढ़ा। इससे पहले 2018 में डीईआरसी ने दिल्ली से पूछा था कि सरकार उपभोक्ताओं के खाते में सीधे बिजली सब्सिडी हस्तांतरित करने पर विचार करेगी। बावजूद इसके डीबीटी के बजाय आम आदमी पार्टी सरकार निजी डिस्कॉम को सब्सिडी का भुगतान करती रही।
डिस्कॉम ने बकाये का नहीं किया था भुगतान
इस मामले में मुख्य सचिव ने अपनी रिपोर्ट में कमियों को उजागर किया है। व्यापार नियमों के नियम 57 के तहत एलजी वीके सक्सेना और मुख्यमंत्री को रिपोर्ट सौंपा गया। मुख्य सचिव की इस रिपोर्ट में डिस्कॉम की तरफ से बकाये का भुगतान नहीं करने की शिकायत दी गई थी। रिपोर्ट में विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 86(2) के तहत डीईआरसी ने वैधानिक सलाह दी थी। घरेलू उपभोक्ताओं के लिए सब्सिडी को सीमित करने पर विचार करने को कहा गया था।
5 किलोवाट से अधिक लोड वाले उपभोक्ता जरूरतमंद नहीं थे इसलिए उन्हें सब्सिडी का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। विद्युत विभाग के समक्ष रखी जिन्होंने तत्कालीन विद्युत मंत्री को इससे संबंधित प्रस्ताव को कैबिनेट में रखने के बजाय सब्सिडी जारी रखने से हर साल सरकारी खजाने पर करोड़ों रुपये का बोझ पड़ा।
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