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दिल्ली हाईकोर्ट
– फोटो : अमर उजाला
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दिल्ली पुलिस के पास जामिया मिलिया इस्लामिया में प्रवेश करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का विरोध कर रहे छात्रों पर बल का प्रयोग किसी भी सार्वजनिक भलाई के लिए पूरी तरह से असंगत है। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने सोमवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल और न्यायमूर्ति तलवंत सिंह की खंडपीठ के समक्ष उन्होंने यह तर्क दिसंबर 2019 में विश्वविद्यालय में भड़की हिंसा से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने रखा। मामले की सुनवाई अब 08 मई को होगी।
जेएमआई के छात्रों द्वारा हिंसा के परिणामों और कारणों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को शामिल करने के लिए समिति के गठन की मांग वाली याचिका पर सुनवाई चल रही है। अधिवक्ता जयसिंह ने कहा कि प्राथमिक प्रश्न है कि पुलिस को परिसर में प्रवेश करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। सवाल यह है कि क्या पुलिस बल का प्रयोग करने के लिए अधिकृत है, यदि हां, तो किस उद्देश्य से और उस बल का अनुपात क्या है? उन्होंने कहा विश्वविद्यालय में पुलिस का प्रवेश पूरी तरह से अनधिकृत था। इस तरह का बल जिसके परिणामस्वरूप लगभग घातक चोटें आती हैं, केवल आत्मरक्षा में या ऐसा करने के लिए कुछ अधिकार क्षेत्र में उचित ठहराया जा सकता है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया है कि उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों को मथुरा रोड के पास संसद तक पहुंचने से रोक दिया। इसके बाद छात्र वापस आने लगे और विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश किया। जयसिंह ने कहा कि इस आशय की एक स्वीकारोक्ति भी है कि पुलिस ने परिसर में प्रवेश करने के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति से कोई अनुमति नहीं ली। अदालत ने दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अधिवक्ता रजत नायर को मामले से संबंधित घटनाओं पर एनएचआरसी की ऑन रिकॉर्ड रिपोर्ट दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
पोस्टमैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत 12वीं के छात्र को ट्यूशन फीस वापस करने का निर्देश
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में दिल्ली सरकार को अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए पोस्टमैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत रुक्मणि देवी जयपुरिया पब्लिक स्कूल के 12वीं के छात्र को 44,100 रुपये की ट्यूशन फीस वापस करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह ने कहा कि वर्तमान मामले में स्कूल द्वारा त्रुटि की गई है कि याचिकाकर्ता द्वारा भुगतान किए गए 44,100 रुपये के शिक्षण शुल्क की प्रतिपूर्ति के लिए स्कूल द्वारा ऑनलाइन फॉर्म नहीं भरा था। नतीजतन, शुल्क की प्रतिपूर्ति नहीं की गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता राहुल सागर सहाय ने कहा कि दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार की छात्रवृत्ति योजना को लागू करने के लिए अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक योजना तैयार की है। केंद्र सरकार भी दिल्ली छात्रवृत्ति योजना में 60 प्रतिशत का योगदान करती है और प्रवेश के समय संस्थानों में मोटी ट्यूशन फीस के पूर्व भुगतान की आवश्यकता के कारण, शिक्षा के दौरान ड्रॉप-आउट की संख्या को कम करने के लिए केंद्र सरकार की योजना तैयार की गई थी।
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