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Atique Ahmed
– फोटो : अमर उजाला
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अतीक अहमद का खौफ एक समय न सिर्फ आम लोगों में, बल्कि पुलिस विभाग में भी व्याप्त था। पूरे देश को दहला देने वाले राजू पाल हत्याकांड में चार साल में चार विवेचक बदल गए। विवेचकों पर इतना दबाव था कि कोई भी इस घटना की विवेचना नहीं करना चाहता था। अब इस मामले की जांच सीबीआई कर रही है।
राजू पाल हत्याकांड के चौथे विवेचक नारायण सिंह परिहार को 2008 में 50 लाख रुपये का ऑफर दिया गया। न मानने पर दुष्कर्म में फंसाने की धमकी भी दी गई लेकिन नारायण सिंह नहीं झुके। उन्होंने न सिर्फ अतीक-अशरफ और उनके गुर्गों के खिलाफ चार्जशीट लगाई, बल्कि छह और आरोपियों को भी एफआईआर में शामिल किया, जिसमें गुड्डू मुस्लिम भी था।
उनके मोबाइल पर कई बार पाकिस्तान के नंबरों से धमकी भरे फोन आए। विधायक राजू पाल को 25 जनवरी 2005 को दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया गया था। इस मामले में पहली विवेचना तत्कालीन थानाध्यक्ष धूमनगंज परशुराम सिंह को मिली थी। इसके बाद इंस्पेक्टर कोतवाली रहे सुरेंद्र सिंह को इसकी विवेचना सौंपी गई।
सुरेंद्र सिंह ने महीनों मेहनत कर चार्जशीट तैयार की। चार्जशीट में अब्दुल कवि समेत दो और लोगों का नाम बढ़ाए लेकिन उनका ट्रांसफर कर दिया गया। इसके बाद इंस्पेक्टर कोतवाली रहे एचएस राय को विवेचना सौंपी गई। मामला चलता रहा। एचएस राय ने लिख दिया कि अब्दुल कवि नाम का कोई शख्स ही नहीं है। 2008 में चौथे विवेचक नारायण सिंह परिहार को विवेचना सौंपी गई, जोकि अब रिटायर हो चुके हैं।
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