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संकट मोचन संगीत समारोह में बांसुरी वादन प्रस्तुत करते पं हरि प्रसाद चौरसिया,
– फोटो : अमर उजाला
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पं. हरि प्रसाद चौरसिया के कांपते हाथों ने वेणु थाम अधरों से जब तान साधी तो लगा ही नहीं कि अभी कुछ देर पहले तक वे व्हीलचेयर पर थे। बांसुरी का वही माधुर्य, तान और सुरों की साधना का कण-कण ने अहसास किया। हर तान के बाद कुछ देर का विश्राम और फिर से होठों पर बंसी सज रही थी।
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संकटमोचन संगीत समारोह के शताब्दी वर्ष की पांचवीं निशा सदियों की बेहतरीन प्रस्तुतियों में दर्ज हो गई। 85 साल के पं. हरिप्रसाद की बांसुरी के जादू को महसूस करने के लिए बजरंगबली की अंगनाई श्रोताओं से ठसाठस थी। प्रस्तुति से आधे घंटे पहले ग्रीन रूम में जब हरिप्रसाद चौरसिया पहुंचे तो उनकी हालत ठीक नहीं थी। मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही थी, ऐसा लगा कि वह अब मंच पर नहीं जा सकेंगे। लेकिन, श्रोताओं का उत्साह और संकटमोचन का मंच देख उनमें जैसे नई ऊर्जा का प्रवाह हो गया। निर्धारित समय से वह मंच पर पहुंचे। मंच पर उनके लिए कुर्सी लगी। मंच पर रखी बांसुरी उठाई तो उनके हाथ कांप रहे थे। अधरों पर बांसुरी रखने में भी उनको थोड़ी परेशानी हो रही थी। कांपते हाथों और हांफते गले पर संगीत की साधना का प्रतिफल हावी रहा। जैसे ही उन्होंने बांसुरी को अधरों पर धरा और फूंक मारी, हर कोई बस वाह-वाह कर उठा। सभी ने संगीत के साधक की अनन्य साधना को अपने अंतस तक महसूस किया।
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