अमेरिकी के डॉलर के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा! सिलिकॉन वैली बैंक के डूबने से सतर्क हुए विकासशील देश

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डॉलर के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है! जी हां, खबर है कि कई विकासशील देश डी-डॉलराइजेशन की बात कर रहे हैं. इनका मानना है कि अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम किया जाना चाहिए. इतना ही नहीं चीन और ब्राजील ने तो इस ओर कदम भी बढ़ा दिए हैं. बीते महीने ही चीन और ब्राजील एक दूसरे की मुद्रा के जरिए ही व्यापार कर रहे थे, बुधवार को अर्जेंटीना ने भी कह दिया कि वह चीन को अमेरिकी डॉलर के बजाए युआन में भुगतान करेगा सवाल है कि आखिर क्या है डी-डॉलराइजेशन और अगर इसे अमल में लाया गया, तो क्या असर होगा?

ब्राजील के राष्ट्रपति ने अमेरिका दबदबे की आलोचना की 

ब्राजील के राष्ट्रपति लुई इनाशियो लुला दा सिल्वा तो दुनिया के व्यापार पर अमेरिका दबदबे की भी आलोचना कर चुके हैं. चीन और रूस भी डी-डॉलराइजेशन की बात करते हैं. खबरें आई थी कि ईरान रूस संयुक्त रूप से एक नई क्रिप्टोकरंसी की तैयारी कर रहे हैं, जो भुगतान के काम आएगी.

कई देश दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं 

एक मीडिया रिपोर्ट में अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च के हवाले से बताया गया है कि ईरान और रूस ने स्विफ्ट जैसे अंतरराष्ट्रीय डॉलर ट्रेडिंग सिस्टम से कटने के कारण आर्थिक रूप से काफी उथल पुथल का समना किया है. ऐसे में देश अब दूसरे विकल्प तलाश रहे हैं. भारत और मलेशिया हाल ही में व्यापार के लिए रुपया में लेनदेन पर तैयार हुए हैं. सऊदी अरब के वित्त मंत्री भी कह चुके हैं कि अमेरिकी डॉलर के अलावा अन्य किसी मुद्रा में व्यापार के लिए तैयार हैं.

डॉलर के विकल्प पर होगी चर्चा 

मार्च में ही नई दिल्ली में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया गया. उस दौरान डॉलर के स्थान पर वैकल्पिक मुद्रा लॉन्च करने की संभावनाओं पर भी चर्चा की गई.

डी-डॉलराइजेशन का क्या होगा प्रभाव 

अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक रिसर्च डी-डॉलराइजेशन की रणनीति को एकदम सटीक नहीं बताते हैं. कहा जा रहा है कि डॉलर जैसी स्थापित मुद्रा से अलग हटने से किसी देश के नेटवर्क इफेक्ट प्रभावित होगा. साथ ही इससे कई तरह के अवरोध भी आएंगे

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