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कन्नौज नगर निकाय चुनाव
– फोटो : अमर उजाला
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लोकसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले नगर निकाय चुनाव के नतीजों ने सियासी हलचल मचा दिया है। जिले की कमोबेश सभी सीट पर बदलाव की बही सियासी बयार ने नई इबारत लिख दी है। कन्नौज जिले में तीनों नगर पालिकाओं से लेकर सभी नगर पंचायत में हुए बदलाव ने कईयों को आईना दिखाया है। सियासी गलियारे में अब इस बदलाव के बाद के नफा-नुकसान को तौला जा रहा है। कई बड़े सियासी चेहरे के माथे पर आए शिकन ने भी काफी कुछ बयान कर दिया है।
कई दशक तक सपा के दबदबे वाले कन्नौज में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जनता ने पूरी तरह से भाजपा का साथ दिया। लेकिन नगर निकाय चुनाव में वह दबदबा नहीं दिखा। यह अलग है कि पिछले बार दो सीट जीतने वाली भाजपा ने इस बार आठ में से सबसे ज्यादा तीन सीट जीता है। लेकिन पिछले बार जीते दो में से एक सौरिख पर बागी के हाथों मिली शिकस्त ने उसकी रणनीति पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। तिर्वा में बमुश्किल मिली जीत ने भी भाजपा को आईना दिखाया है। छिबरामऊ में जरूर भाजपा चेहरा बदलकर लगातार दूसरी बार काबिज हो गई है। सदर सीट पर मिली करारी शिकस्त ने उसकी सियासी हसरत पर पानी जरूर फेर दिया है। तालग्राम में तीसरे स्थान पर खिसकने और सिकंदरपुर में मौजूदा चेयरमैन पर दांव लगाने के बाद भी मिली शिकस्त ने पार्टी के रणनीतिकारों के माथे पर बल ला दिया है। समधन में भाजपा ने पहले ही मैदान छोड़ दिया था। अंदरखाने जिसे समर्थन दिया था, वह भी मुकाबले में नहीं दिखा।
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