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पटना में 51 जोड़े करेंगे शादी।
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
बिहार में पिछले 13 साल से हो रहा ‘एक विवाह ऐसा भी’ इस बार भी फिर चर्चा में है। इस खास शादी में हर बार कुछ अलग होता है। इस बार पटना के SK मेमोरियल हॉल में 51 जोड़े शादी करेंगे। शाम छह बजे सारे दूल्हे घोड़ी चढ़कर महाराणा प्रताप भवन से एकसके मेमारियल के लिए निकल गए। इसमें तीन दिव्यांग जोड़े शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं। ‘एक विवाह ऐसा भी’ कई मायनों में अलग होगा। शादी की बाकी खूबसूरती के बीच देश के नामी लोग शिरकत करेंगे। इसी बीच थैलीसीमिया, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, हीमोफीलिया जैसे गंभीर मुद्दे पर अनूठे तरीके से समाज को मैसेज दिया जाएगा। आइए जानते हैं ‘एक विवाह ऐसा भी’ क्यों देश में अजूबा है…
रीतियों-रिवाजों के साथ शादी कराई जाती है
यहां मजबूरी के कारण शादी नहीं कर पा रहे जोड़ों की उनकी रीतियों-रिवाजों के साथ शादी कराई जाती है। इसमें समाज के प्रबुद्ध और सम्मानित विभूतियों के आशीर्वाद के अलावा इन जोड़ों को गृहस्थी आरम्भ करने के लिए महत्वपूर्ण सामग्री भी उपहार स्वरूप प्रदान किए जाते हैं। मां वैष्णो देवी सेवा समिति यह सब करती है। इसी समिति ने बिहार में आम लोगों के प्रयास से आम लोगों के लिए मां ब्लड सेंटर की स्थापना की है।
वर की उम्र 21 वर्ष और वधू की उम्र 18 से कम नहीं होनी चाहिए
अगर कोई भी ऐसा आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार है, जिन्होंने अपने बेटियों की शादी तय कर दी है या उन्होंने अपने बेटियों के लिए दूल्हा देख लिया है लेकिन पैसे के अभाव में उनकी शादी नहीं हो पा रही है तो वे इस संस्थान से निःशुल्क फॉर्म ले कर रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। रजिस्ट्रेशन कराने से पहले यह ध्यान में रखना जरुरी है कि वर की उम्र कम से कम 21 वर्ष और वधु की उम्र 18 वर्ष होनी चाहिए। शादी के लिए यहां इससे संबंधित प्रमाण-पत्र भी लिया जाएगा।
चयनित जोड़ों को पटना बुलाया जाता है
एक विवाह ऐसा भी’ के लिए रजिस्ट्रेशन खत्म होने के बाद विभिन्न इलाकों से चयनित जोड़ों को पटना बुलाया जाता है और वहां उनसे शादी के लिए अंतिम सहमति ली जाती है। इस दौरान वर और वधु के परिवार वालों से पूछा जाता है कि दोनों पक्ष आपसी सहमति से शादी कर रहे हैं, वहीं वर-वधु की भी सहमति ली जाती है। अंतिम चयन के बाद 51 वरों को सूट पीस और 51 वधुओं को शगुन की साड़ी दी जाती है।
हमारा मकसद हर बार एक नए मुद्दे को उठाना होता है
सामाजिक कार्यकर्ता मुकेश हिसारिया का कहना है कि 2010 से यह मुहिम चल रही है। यह एक सामूहिक विवाह नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य एक ऐसा वातावरण तैयार करना है जिसमें लोगों के दिल मिलें और दिल की बात बाकी लोगों तक पहुंचे। इसमें कई तरह के ऐसे मैसेज दिए जाते हैं, जिससे परिवार खुशहाल रहे। जैसे- थैलीसीमिया, हीमोफीलिया, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी के बारे में आम लोगों को कम जानकारी थी तो उसपर विस्तार से यहां बताया जाता है ताकि भविष्य न बिगड़े। जब दो थैलीसीमिया माइनर की शादी होती है तो ऐसे बच्चों का जन्म होता है जिन्हें जिन्दगी भर ब्लड चढ़ाना पड़ सकता है। इस कार्यक्रम के बहाने लोगों को जागरूक करने का काम करते हैं। हमारा मकसद हर बार एक नए मुद्दे को उठाना होता है। जैसे पिछली बार थैलीसीमिया विषय को उठाया तो लोगों ने इस मुद्दे को बड़े ही संजीदगी से महसूस किया और थैलीसीमिया से पीड़ित मरीजों के लिए सहयोग भी किया। एक बार एसिड अटैक पीड़ित लोगों को सामने लाया, जिसके बाद मुख्यमंत्री ने सभी एसिड पीड़ित लोगों को तीन तीन लाख रुपये दिए थे। इस बार हम मस्कुलर डिस्ट्रॉफी पीड़ित मरीजों को सामने ला रहे हैं।
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