Sirmour News: टटियाणा में 120 गांवों के शाठी और पाशी पक्षों ने गले मिलकर दिया भाईचारे का संदेश, देखें तस्वीरें

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महासुआ रक्षा राखे, ठारिया रक्षा करे, ठारी माता की जय। पूरा दिन ऐसे ही उद्घोषों से हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले का टटियाणा गांव शांत पर्व के दौरान गूंजता रहा। शिलाई विधानसभा क्षेत्र के टटियाणा गांव स्थित महासू देवता के मंदिर में ठारी माता के इस धार्मिक अनुष्ठान में पहले दिन 120 गांव के हजारों लोगों ने शिरकत की। जहां स्थानीय ग्रामीणों ने हर गांव के मेहमानों का अलग-अलग पारंपरिक वाद्य यंत्रों से स्वागत किया। समारोह रविवार को भी चलेगा। करीब 120 साल बाद हो रहे शांत पर्व में शिरकत करने पहुंचे दूसरे गांव के लोगों को मुख्य सड़क से ढोल नगाड़ों की धुनों पर शाठी-पाशी चौंतरे तक लाया गया। 

लोग डांगरों के साथ नाचते और जयकारे लगाते हुए चौंतरे तक पहुंचे। यह पहला मौका था जब शाठी और पाशी क्षेत्र के लोग शांत समारोह में एक साथ एकत्रित हुए। जबकि, दोनों पक्षों के लोग एक-दूसरे की शांत में शामिल नहीं होते। टटियाणा के इस ऐतिहासिक चौंतरे में दोनों पक्षों के लोगों ने शिरकत कर एकता का संदेश दिया है। एक दूसरे के गले लगकर भाईचारे का भी संदेश दिया है। इस दौरान मेहमानों को महासू देवता मंदिर के स्मृति चिन्ह भेंट किए गए।

चौंतरे पर होता था न्याय

दरअसल, शाठी-पाशी के झगड़ों के फैसले टटियाणा के इसी ऐतिहासिक चौंतरे (महासू देवता मंदिर परिसर) में किए जाते थे। राजा सिरमौर ने अपने राज्य के अधीनस्थ क्षेत्र में चौंतरे की जगह का चयन किया था। दो चौंतरे जौनसार बाबर और दो चौंतरे गिरिपार क्षेत्र में बनाए, जिसमें एक चौंतरा संगड़ाह तो दूसरा टटियाणा बनाया। टटियाणा गांव में बने चौंतरे का क्षेत्र लाघी क्षेत्र, आंजभोज से लेकर मस्तभोज, कोटीबौंच और गनोग क्षेत्र तक आता है। न्याय के साथ साथ इन चौंतरों में कई ऐतिहासिक फैसले लिए जाते थे।


क्या कहते हैं बुजुर्ग

टटियाणा गांव के बुजुर्ग चेतराम ने कहा कि रजवाड़ा शाही के दौरान की बातें हैं कि शाठी और पाशी के झगड़े जो कहीं नहीं मिटते थे, उन्हें टटियाणा के इस चौंतरे पर सुलझाया जाता था। खुइनल गांव बुजुर्ग तोताराम शर्मा का कहना है कि पहले मौण (मछली मारने) पर जाने के दौरान शाठी और पाशी के बीच अक्सर झगड़े होते थे। झगड़े खून खराबे तक पहुंच जाते थे। उस समय खून करने का दंड दो रुपये होता था, जो मौके पर ही ग्रामीण दंड का भुगतान कर मसले को सुलझा देते थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया, जमाना बदलता गया। आज के दौर में शाठी-पाशी भाईचारे की मिसाल कायम कर रहे हैं।


हर गांव ने दी भेंट

शांत पर्व में पहुंचे हर गांव के लोगों ने भेंटस्वरूप कुछ न कुछ जरूर दिया। किसी गांव के लोगों ने बकरा भेंट किया तो किसी ने नकदी। कुछ गांव के लोगों ने बड़े-बड़े बर्तन भी भेंट किए, जिसमें भंडारे आदि के दौरान भोजन पकाया जाता है। गांव मायाराम शर्मा ने बताया कि 1 जुलाई की शांत में लगभग 15 बकरे, 5 बड़े डब्बे और पांच लाख नकदी दान के तौर पर दी गई है।


तालियां बजाकर, हाथ जोड़कर अतिथियों का स्वागत

टटियाणा गांव के युवा बाहर से आए मेहमानों का जगह-जगह स्वागत करते दिखे। पूरी व्यवस्था को देखकर हर कोई हैरान था। युवाओं ने तालियां बजाकर और हाथ जोड़कर अतिथियों का स्वागत किया। इस कार्य में गांव सैकड़ों युवा लगे थे।


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