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Delhi Flood
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
यमुना के उफान से बेशक इस वक्त दिल्ली में दूर-दूर तक पानी भरा है, लेकिन हथिनीकुंड बैराज से 2019 व 2013 की तुलना में एक घंटे में छोड़े जाने वाले अधिकतम पानी की मात्रा इस साल कम है। वहीं, बाढ़ के दौरान दिल्ली-एनसीआर में बारिश भी नहीं हो रही है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि इसकी बड़ी वजह यमुना की तलहटी का उथला होते जाना है। नालों की गाद और निर्माण सामग्री को बाढ़ क्षेत्र में छोड़े जाने का मिला-जुला असर यह हो रहा है कि नदी की गहराई साल-दर-साल कम होती गई है। इससे बाढ़ के पानी को अपने भीतर रोके रखने की नदी की क्षमता घटी है। अगर इसका वक्त रहते उचित इंतजाम नहीं किया गया तो आने वाले समय में दिल्ली की बाढ़ बड़ा संकट बनेगी।
केंद्रीय जल आयोग के आंकड़े बताते हैं कि इस साल हथिनी कुंड से एक घंटे में सबसे ज्यादा पानी 11 जुलाई को 11 बजे छोड़ा गया। इसकी मात्रा 3.59 लाख क्यूसेक थी। यह अभी तक इस साल का पीक डिस्चार्ज है जबकि 2013 व 2019 में यह आंकड़ा 8 लाख क्यूसेक से ज्यादा था। बावजूद इसके बाढ़ जनित त्रासदी मौजूदा वक्त तुलना में बीते दोनों सालों में कम थी। उस दौरान यमुना अपनी सरहद को नहीं लांघी थी और न ही बांधों में दरार ही डाली थी जबकि इस साल यमुना का रूप दिल्ली में विकराल है।
विशेषज्ञ इसकी एक वजह यमुना की तलहटी की लगातार बढ़ रही ऊंचाई का मान रहे हैं। वहीं, निर्माणाधीन बारापूला फ्लाईओवर व दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल प्रोजेक्ट की निर्माण सामग्री ने भी प्रवाह में अवरोध पैदा किया है। दिल्ली विवि के भूविज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ शशांक शेखर बताते हैं कि यह हकीकत है कि नालों की गाद से यमुना नदी की तलहटी लगातार उथली हो रही है। इससे नदी का प्रवाह क्षेत्र बाढ़ के पानी को सीमित नहीं रख पा रहा है।
इसका वास्तविक स्तर क्या है, इस बारे में विस्तृत अध्ययन करना आज की दिल्ली के लिए बेहद जरूरी है। इसके बाद ही बगैर इको सिस्टम में ज्यादा छेड़छाड़ किए बिना ठीक तरीके से नदी के चैनल का डिसिल्टेशन किया जा सकेगा। जहां तक पुलों के निर्माण की बात है कि पानी रोककर ही पिलर खड़े किए जाते हैं। लेकिन अगर इसका मलबा समय से नहीं निकाला गया तो बाढ़ के प्रवाह में अवरोध पैदा ही करेगा। वहीं, बाद में यह मलबा नदी की तलहटी को ऊंचा करेगा।
पुलों के पिलर प्रवाह में डालते बाधा, जमा होती गाद
यमुना नदी पर अध्ययन करने वाले व सेंट्रल युनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार के एनवायरमेंटल साइंस के प्रो. रामकुमार के मुताबिक, नदी के पिलर तलहटी में गाद जमने में मदद करते हैं। असल में पिलर से टकराने से पानी का प्रवाह क्षैतिज हो जाता है। नजफगढ़ और उसके बाद यमुना में गिरने वाले नालों से नदी की ऊपरी सतह में गाद बहुत ज्यादा होती है। पिलर से टकराने के बाद यह पानी नीचे बैठता है और अपनी गाद छोड़ देता है। इससे गाद जमने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
मलबा भी इस प्रक्रिया को बढ़ा देता है। इसका असर दिल्ली में यमुना की तलहटी के उथला होने के तौर पर हुआ है। वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट डॉ. फैयाज खुदसर का कहना है कि वजीराबाद बैराज से ऊपर और नजफगढ़ नाले के मिलने के बाद के सिल्ट में बड़ा फर्क है। हमने अपने अध्ययन में इसे साफ तौर पर देखा भी है। ऊपर जब हम यमुना की तलहटी से मिट्टी निकालते हैं तो वह रेत होती है।
बीते सालों में हथिनीकुंड से पीक डिस्चार्ज
- 3 सितंबर 1978 7,09,000 क्यूसेक
- 20 सितंबर 2010 7, 44, 507 क्यूसेक
- 17 जून 2013 8,06,464 क्यूसेक
- 18 अगस्त 2019 8,28,000 क्यूसेक
- 10 जुलाई 2023 3,09,526 क्यूसेक
- 11 जुलाई 2013 3, 59,760 क्यूसेक
डीसिल्टिंग सबसे कारगर उपाय
विशेषज्ञ बताते हैं कि यमुना को अपने पुराने तल तक ले जाने का सबसे बेहतर तरीका डीसिल्टिंग होगा। इससे नदी की तलहटी का प्रोफाइल तो बदलेगा, लेकिन नुकसान कम होगा।
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