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करम डाइर की अनिवार्यता और करमा-धरमा की कहानी
इस पर्व का दूसरा अनिवार्य तत्त्व है करम डाइर. उपवास की रात अखरा में ‘करम’ वृक्ष की डाली को स्थापित किया जाता है. इसका निहितार्थ स्पष्ट है, भाइयों को, अर्थात् पुरुष वर्ग को अपने कर्मों-दायित्वों के प्रति गड़े करम डाल की तरह अडिग रहना, जीवन के कर्मों के प्रति सदैव प्रतिबद्ध रहना. उपवास की रात को करम अखरा में वाचन-श्रवण की जानेवाली ‘करमा-धरमा’ की लोक कथा इस महान पर्व की धर्मकथा है. इसमें निहित संदेश शाश्वत जीवन-दर्शन से युक्त है. इसमें बताया गया है कि मानव जीवन में कर्म के साथ धर्म का समन्वय आवश्यक है. केवल कर्म से हम भौतिक परिणाम तो पा सकते हैं, पर कर्मों को यदि नीति-आदर्श से हीन कर दें तो उसकी कोई महत्ता नहीं रह जाती है. धर्महीन व्यक्ति की उपयोगिता नष्ट हो जाती है, उसका जीवन विकृत-विद्रूप हो जाता है. कथा में करम गोसाईं के रूठ कर ‘सात समुंदर टापुपार’ चले जाने का प्रसंग भी हमें धर्मविहीन जीवन में खुशियों के रूठ जाने की प्रतीकात्मक सीख देता है.
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