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अतीत का अलीगढ़
– फोटो : अमर उजाला
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आपको जानकर हैरानी होगी कि अंग्रेजों ने जिले में बैंक भी जातियों के आधार पर खोले थे। जिस जाति के लिए बैंक खोला गया था, उसमें उसी जाति के लोग लेन-देन कर सकते थे। जिले में ग्रामीण बैंक की शुरुआत सर्वप्रथम अतरौली तहसील के अरनी में 1902 में हुई थी।
अंग्रेजी दस्तावेज बताते हैं कि इसने काफी अच्छा काम किया था। 1905 में खैर में दो बैंक खोले गए थे। एक जाटों के लिए और दूसरा चमार जाति के लोगों के लिए था। खैर में खोले गए जाति आधारित बैंकों का प्रदर्शन खराब रहा। इसके एक वर्ष बाद ( 1906 में) अतरौली के बैन में दो बैंक खोले गए । एक मुसलमानों के लिए था और दूसरा चमार जाति के लिए। इसी साल अलीगढ़ तहसील के देवसैनी में एक और बैंक खोला गया लेकिन यह ज्यादा प्रगति नहीं कर पाया। जाति आधारित बैंकों के खोलने के प्रयोग को अंग्रेजों ने अपनी रिपोर्टों में सफल बताया।
1906 में रसलगंज में खोली गई थी बैंक ऑफ बंगाल की शाखा
अलीगढ़ के रसलगंज मोहल्ले में सरकारी दवाखाने के पास बैंक ऑफ बंगाल की शाखा खोली गई थी। इसे खोलने का उद्देश्य सामान्य बैंकिंग लेनदेन के अलावा हुंडी (गिरवी पर कर्ज देने) का था। तत्कालीन सरकारी खजांची लाला चिरंजी लाल इसके सब-एजेंट थे। चिरंजी लाल शहर की सबसे पुरानी व्यावसायिक फर्म मानसिंह-जवाहर लाल के स्वामी और प्रबंधक थे। चिरंजी लाल की अलीगढ़ में काफी प्रतिष्ठा थी। उनके पास जमीन-जायदाद थी। उनके परिवार में आर्थिक संपन्नता ब्रिटिश काल के दौर में आई, जब एक कुशल बैंक व्यवसायी के रूप में मान सिंह ने अपना लोहा मनवाया।
इंपीरियल बैंक की एक शाखा अलीगढ़ के मामू-भांजा मोहल्ले में 1906 में खोली गई। इसका मुख्यालय मेरठ में था। हालांकि इसके कई डायरेक्टर अलीगढ़ जिले के ही थे। इसके अलावा बैंक ऑफ बंगाल और इलाहाबाद बैंक की शाखाएं हाथरस में खोली गईं। इन बैंकों के अतिरिक्त अन्य कोई सार्वजनिक बैंक नहीं खोला गया।
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