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प्रो डीके सिंह।
– फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
पर्यावरणीय असंतुलन के गंभीर परिणाम 21वीं सदी के प्रारंभिक दो दशकों में ही दिखने लगे हैं। वर्ष 2013 में केदारनाथ और वर्ष 2021 में जोशीमठ में हिमालय ग्लेशियर के टूटने की घटना पर्यावरणीय असंतुलन के ही परिणाम हैं। आने वाले दिनों में यह स्थिति और खतरनाक होने जा रही है। ऐसे में हमें अभी से पर्यावरण के संरक्षण के प्रति जागरूक होकर चार ””पी”” यानी प्लांटेशन, प्रिजर्वेशन, प्रोटेक्शन और पार्टिसिपेशन के सिद्धांत पर काम करना होगा।
ये बातें शुक्रवार को डीडीयू के प्राणि विज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डीके सिंह ने अमर उजाला की ओर से आयोजित बाल मेले में कहीं। शहीद अशफाक उल्ला खां प्राणि उद्यान में आयोजित कार्यक्रम में पर्यावरणीय असंतुलन पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले 50 साल में हमारे बच्चे इस पर्यावरणीय संकट से जूझने में लगेंगे। उन्होंने कहा कि संपूर्ण सृष्टि पांच तत्वों- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृृथ्वी से मिलकर बनी है। ये अगर संतुलित नहीं हैं तो दुनिया की कोई ताकत पर्यावरण का संरक्षण नहीं कर सकती है। मनुष्य ने अपने क्रिया कलापों से इन पांच तत्वों का संतुलन बदल दिया है। अब इसे ठीक करना भी हमारा ही काम है।
उन्होंने कहा कि इस बदलते परिवेश में इस असंतुलन के मूल में ””तीन-पी”” हैं। ये हैं पॉपुलेशन, प्रॉस्पेरिटी और पॉल्युशन। बढ़ती हुई पॉपुलेशन यानी जनसंख्या को खाना, मकान और कपड़े चाहिए। 18वीं शताब्दी में विश्व की जनसंख्या एक अरब थी, 1950 में साढ़े तीन अरब हुई और अब करीब आठ अरब हैं। इस जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए हमने वनों को काटा। प्राकृतिक संपदा को नष्ट किया। 1961 तक हम 71 प्रतिशत प्राकृतिक संपदाओं का इस्तेमाल करते थे। 1990 तक आते-आते यह आंकड़ा 120 फीसदी तक पहुंच गया। इससे प्रकृति का संतुलन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
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