उत्तराखंड स्थापना दिवस: ‘राज्य निर्माण की अवधारणा की बुनियाद भी नहीं रख पाए’, 23 साल बाद हैं ऐसे हालात

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Uttarakhand Foundation Day 9th November State agitator Ravindra Jugran Article

रविंद्र जुगरान, पूर्व अध्यक्ष, राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद
– फोटो : amar ujala



विस्तार


मेरा अनुभव है कि 23 वर्ष बाद भी हम राज्य निर्माण की मूल अवधारणा की बुनियाद भी नहीं रख पाए। पहाड़ का पानी पहाड़ के काम आए। जल, जंगल और जमीन पर हमारा अधिकार हो, यह इंतजार अभी खत्म नहीं हुआ है। हमारी दशा चिंताजनक है और दिशा स्पष्ट नहीं है। निसंदेह हमें इस बात पर गुमान है कि हम दुनिया के अपनी तरह के अहिंसक और सफल जनांदोलन के साक्षी रहे।

हमने बताया कि केवल हिंसक युद्ध ही मांगों और मसलों के समाधान नहीं है। लाख बरबता के बावजूद अहिंसा के मार्ग से जायज मांगें मनवाई जा सकती हैं। हमारे यहां हर घर से औसतन एक व्यक्ति सेना या अर्द्धसैनिक बल में है। हम मार्शल कौम हैं फिर भी हमने अहिंसा का ही रास्ता अपनाया।

यूपी की तुलना में उत्तराखंड में भ्रष्टाचार भी कई गुना बढ़ा

पहाड़ की पहाड़ जैसी समस्याओं के समाधान, रोजगार, बेहतर शासन-प्रशासन और अपनी अलग पहचान के लिए ही हमारे लोगों ने शहादतें दीं, मगर अभी तक इस यात्रा में पहाड़ का जनमानस खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। हमारा हेप्पीनेस इंडेक्स नीचे जा रहा है। अविभाजित उत्तरप्रदेश में लखनऊ से लिए गए फैसले सुदूर पहाड़ में धरातल पर उतर जाते थे।

लेकिन, अपना राज्य बनने के बाद ऐसे ही फैसले देहरादून से लागू नहीं हो पा रहे हैं। गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों में रौनक रहती थी। काम होते थे।प्रशासनिक मशीनरी वहीं से चलती थी। आज दोनों कमीशनरी सफेद हाथी बनकर रह गई हैं। पूर्ववर्ती उत्तरप्रदेश की तुलना में उत्तराखंड में भ्रष्टाचार भी कई गुना बढ़ा है।

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