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करगिल विजय दिवस
– फोटो : Social media
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कारगिल युद्ध में दुशमन के साथ दो-दो हाथ करने वाले जवानों का आज भी खून खौल उठता है। कारगिल में बहुत जवान मातृ भूमि पर कुर्बान हो गए, लेकिन कुछ जवान ऐसे भी थे जो आज भी उस युद्ध की घटनाओं के साक्षी हैं। इनमें से एक हैं 16 ग्रेनेडियर के सेवानिवृत्त जवान यशपाल।
कारगिल में उनकी रेजिमेंट को मई 1999 में भेजा गया था। यशपाल बताते हैं कि पहले उन्होंने तोलोलिंग पर कब्जा करने के लिए दुशमनों के छक्के छुड़ाए। बाद में उन्हें टाइगर हिल पर कब्जा करने के लिए भेजा गया।
तीन जुलाई को वह लोग टाइगर हिल पर पहुंच गए थे। पाकिस्तान के सैनिक उंचाई पर बैठे थे। जैसे ही वह पहुंचे तो उन्होंने पत्थर गिराने शुरू कर दिए। पाकिस्तानी सैनिक उन्हें गालियां तक देते थे। हमारे जवानों व अधिकारियों को एक ही टास्क दिया गया था कि टाइगर हिल पर तिरंगा फहराना है।
भारतीय बोफोर्स तोपों ने पाक सैनिकों को बांधे रखा और इसी बीच उनकी रेजिमेंट वहां पहुंच गई। पाकिस्तान की 12 नार्दर्न इनफेंन्ट्री के जवान अपना सामान छोड़कर भाग निकले। वह सिविल कपड़ों में लड़ाई कर रहे थे। यशपाल के अनुसार, पाकिस्तान की सेना के एक कैप्टन को उनकी रेजिमेंट के जवानों ने मार गिराया।
पाकिस्तान ने शव लेने से ही इंकार कर दिया था। उन्होंने बताया कि पांच जुलाई को टाइगर हिल को पाक सैनिकों से मुक्त करवा लिया गया था। यशपाल के अनुसार उनकी 16 ग्रेनेडियर ने सबसे अधिक शहादतें दीं। इसमें दो अधिकारी, दो जेसीओ और 30 जवान शामिल हैं। परमवीर चक्र से नवाजे गए जोगिन्द्र यादव भी उनकी रेजिमेंट के थे। यशपाल के अनुसार आज भी पुराने दिनों की याद ताजा होते ही खून खौल उठता है।
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