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गोरखपुर जिले के बिलंदपुर में अयान की कार में बंद होने से मौत के बाद से परिजन स्तब्ध हैं। उन्हें हर पल अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता सता रही है। कार के पास बच्चों को खेलता देखकर लोग टोक रहे हैं कि उसमें अकेले मत बैठना। मगर कार ही नहीं, स्कूली बच्चों के इर्द-गिर्द तमाम खतरे और भी मंडरा रहे हैं। अनजान ऑटो-ईरिक्शा चालक, खुले नालों और भारी वाहनों के बीच बच्चे हर पल खतरे का सामना कर रहे हैं। ऐसे में अगर अभिभावक जागरूक नहीं हुए तो नौनिहाल कब हादसे के शिकार हो जाएं, कहा नहीं जा सकता।
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ऑटो में ठूंसकर ले जाए जा रहे बच्चे आपके घर के तो नहीं
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शुक्रवार दोपहर 12 से 1:30 के बीच सिविल लाइंस क्षेत्र में स्थित लगभग सभी स्कूलों के बाहर ई-रिक्शा और ऑटो की लंबी कतार दिखी। जैसे ही छुट्टी हुई, स्कूल के बाहर खड़े ऑटो और ई-रिक्शा बच्चों से भर गए। चालक, बैग ऑटो की छतों पर रख दे रहे थे, क्योंकि ऑटो में रखने तक की जगह नहीं थी। ऑटो में छह लोगों की सीट पर आठ से 10 बच्चे और ई-रिक्शा की चार लोगों की सीट पर छह से आठ बच्चे बैठे नजर आए।
कुछ चालकों ने तो छोटे बच्चों को ही आगे की सीट पर बैठा लिया था। ठसाठस भरे बच्चों को देखकर ही डर लग रहा था कि उछल-कूद और ताकझांक में कहीं नीचे न गिर पड़े।
नहीं मिलता है स्कूल परमिट
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बच्चों के स्कूल लाने और ले जाने को लेकर परिवार के लोग बहुत गंभीर हैं। इसलिए बच्चों को ऑटो से स्कूल नहीं भेजती हूं। नौकरी करने के बावजूद समय निकालकर खुद बच्चों को स्कूल छोड़ने आती हूं और लेकर जाती हूं।-प्रतिमा श्रीवास्तव, विजय चौक
पहले बच्चे को ऑटो से स्कूल भेजती थी, स्कूटी से खुद ही बच्चे को छोड़ने आती हूं और उसे लेकर घर जाती हूं। सभी अभिभावकों को अपने बच्चों की सुरक्षा का ख्याल रखना चाहिए, उन्हें ऑटो और ई रिक्शा से स्कूल नहीं भेजना चाहिए। -विभा सिंह, तारामंडल
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ऑटो और ई-रिक्शा चालक बच्चों को वाहन में मानक की तुलना में ज्यादा बैठाते हैं, इससे उनकी जान पर खतरा बना रहता है। बच्चों की सुरक्षा के लिए हम सभी काम छोड़कर घर से बच्चों को छोड़ने और लेने आते हैं। -सविता, मोहद्दीपुर
ऑटो और ई-रिक्शा चालकों के भरोसे बच्चों को नहीं छोड़ना चाहिए। उन्हें बच्चों की सुरक्षा का ख्याल नहीं रहता है। ज्यादा कमाई के लिए वह बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ करते हैं। अभिभावकों को खुद ही बच्चों को स्कूल छोड़ने और लेने जाना चाहिए। राजेश सोनकर, सिनेमा सुमेर सागर रोड
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