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गोवा स्वतंत्रता संग्राम (फाइल)
– फोटो : Social Media
विस्तार
गोवा की आजादी के लिए 1954 में जम्मू-कश्मीर से गया 20 लोगों का दल पूरे दमखम के साथ लड़ा था। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन गोवा में पुर्तगाली शासन ही रहा। लगभग 451 वर्षों के बाद 19 दिसंबर 1961 में गोवा को भारतीय सेना ने कब्जे में लिया। यह सब आरएसएस के आंदोलन और भारत सरकार के दबाव के कारण संभव हो सका। जम्मू-कश्मीर से गोवा गए दल में पंडित आत्मा राम निवासी पलौड़ा, सुरेंद्र मोहन शर्मा निवासी तोफशेरखानिया और सुरजीत गुप्ता निवासी रिहाड़ी शामिल थे।
92 वर्षीय आत्मा राम ने बताया कि 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया था, लेकिन गोवा आजाद नहीं था। यहां पर पुर्तगालियों का शासन था। लोगों पर अत्याचार हो रहे थे। डर का माहौल था। देशभर में लोग गोवा के हालात से परिचित थे। गोवा में पुर्तगालियों से बचते बचाते आरएसएस से स्वयंसेवी पहुंचते और लोगों की समस्याओं को सुनते।
लोगों ने स्वयंसेवियों को आपबीती बताई। इसके बाद आरएसएस को आंदोलन करने के लिए कहा गया। इसके बाद देशभर से स्वयंसेवियों ने लड़ाई में भाग लिया। जम्मू-कश्मीर से 20 लोग गोवा पहुंचे। शामतवाड़ी पहुंचने पर लोगों ने बताया कि दिन में पैदल मत चलना। रात के समय पैदल यात्रा करना। इसके बाद दल दिन में आराम करता, फिर रात के समय आगे बढ़ता। कई दिनों तक पैदल चले, जहां पर आंदोलन शुरू हुआ।
पुर्तगाली सेना ने दल के सदस्यों को पकड़ लिया और यातनाएं दीं। पुर्तगालियों ने दल के सदस्यों को महाराष्ट्र में समुद्र किनारे छोड़ा। दल के सदस्य काफी सहमे हुए थे। कुछ पता नहीं चल रहा था कि कहां जाना है। चारों तरफ पानी ही पानी दिख रहा था।
इसी दौरान भारतीय सेना पहुंची। यहां से सेना ने दल को महाराष्ट्र में एक अस्पताल में दाखिल करवाया। एक माह तक इलाज चला। इसके बाद वापस जम्मू-कश्मीर पहुंचे थे। इसके बाद सरकार और आरएसएस के सत्याग्रह के कारण 19 दिसंबर 1961 को गोवा आजाद हुआ, जिसे सेना ने अपने कब्जे में लिया।
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