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सीएम पुष्कर सिंह धामी
– फोटो : अमर उजाला
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धामी सरकार का एक साल का कार्यकाल चुनौतियों से निपटने और सख्त फैसले लेने में गुजर गया। 12 महीने की अवधि में शायद ही किसी महीने धामी सहज हुए हों। उन्होंने एक चुनौती से पार पाया तो दूसरी ने दरवाजे पर दस्तक दे दी।
इनमें भर्ती परीक्षा घोटाला, अंकिता हत्याकांड और जोशीमठ आपदा की चुनौती ने धामी सरकार को सबसे ज्यादा मुश्किल में डाला। इन चुनौतियों से जूझते हुए उन्होंने कई सख्त फैसले लिए और महिलाओं और राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के लिए कानून बनाए।
अमर उजाला ने धामी सरकार के एक साल के कार्यकाल की प्रमुख मुश्किलों, बड़े फैसले और भावी चुनौतियों की पड़ताल की। पेश है ये रिपोर्टः
- महिला आरक्षण : उच्च न्यायालय ने महिलाओं के सरकारी नौकरियों में 30 फीसद क्षैतिज आरक्षण के शासनादेश पर रोक लगाई। धामी सरकार ने कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। वहां से राहत मिलने के बाद कानून बना दिया।
- आंदोलनकारियों का आरक्षण : राज्य आंदोलनकारियों के 10 फीसद क्षैतिज आरक्षण का भी सरकार पर दबाव बना। सीएम धामी ने राजभवन से सात साल से लंबित पड़े विधेयक को वापस मंगवाया और कैबिनेट ने राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने का फैसला लिया।
- धर्मांतरण पर रोक : धामी सरकार में जबरन धर्मांतरण कानून को और अधिक सख्त बना दिया गया। इसमें 10 साल तक सजा का प्रावधान किया गया।
- नकल विरोधी कानून : प्रतियोगी परीक्षाओं में घपला सामने आने के बाद सरकार ने नकल विरोधी कानून बनाया और इसमें 10 साल तक की सजा और संपत्ति जब्त करने के कठोर प्रावधान किए।
- विस बैकडोर भर्ती : विधानसभा में बैकडोर से लगे 228 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया। स्पीकर के अनुरोध पर सरकार ने इसकी अनुमति दे दी।
- डबल जीडीपी : पांच साल में प्रदेश की राज्य के सकल घरेलू उत्पाद दर को दोगुना करने का लक्ष्य बनाया। 2025 तक सशक्त उत्तराखंड बनाने के लिए पहली बार नौकरशाही और मंत्रियों ने मसूरी में चिंतन किया और विकास के एजेंडे के अनुरूप अपनी नीतियां तय कीं।
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