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मणिकर्णिका घाट
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
मणिकर्णिका महाश्मशान नहीं आदितीर्थ है। हरिश्चंद्र घाट का राजा हरिश्चंद्र से कोई सीधा संबंध नहीं है। काशी के अविमुक्त क्षेत्र के अंदर जो महाश्मशान है उसका असली स्थान जलासेन घाट है। लंबे समय से मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर जो भी मिथक हैं, उसे बीएचयू और काशी के विद्वानों की आनंदकानन वन काशी ढूंढे टीम ने सिरे से खारिज कर दिया है।
बीएचयू के धर्म विद्या विज्ञान संकाय, केंद्रीय ब्राह्मण महासभा और काशी के विद्वानों ने काशी खंड और 18 पुराणों के अध्ययन के बाद मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट के इस सच को सामने रखा है। 15 दिनों के अध्ययन और खोज के बाद विशेषज्ञों और विद्वानों ने बताया कि मणिकर्णिका श्मशान नहीं काशी का आदितीर्थ है। इसे महाश्मशान या श्मशान कहना उचित नहीं है। काशी के अविमुक्त क्षेत्र के अंदर जो महाश्मशान है उसका स्थान जलासेन घाट है। वहीं पर जलासेनी शिवलिंग भी गंगा के अंदर विराजमान है जो शिव के साधकों को ही नजर आता है।
जलासेन घाट पर ही खुद को बेचा था राजा हरिश्चंद्र ने
काशी के जिस अविमुक्त महाक्षेत्र के महाश्मशान में राजा हरिश्चंद्र ने अपने सत्य के धर्म को पूर्ण करने के लिए अपने आपको बेचा था। वह पवित्र स्थान मणिकर्णिका तट पर ही है। काशी खंड के श्लोक के अनुसार वह स्थान मां विशालाक्षी देवी के सामने जलासेन घाट ही था। मणिकर्णिका कुंड के उत्तर में राजा हरिश्चंद्र द्वारा स्थापित हरिश्चंद्रेश्वर शिवलिंग एवं हरिश्चंद्र विनायक और वहीं सीमा विनायक विद्यमान हैं। मान्यता है कि मणिकर्णिका तीर्थ पर गंगा में जो मनुष्य हरिश्चंद्र महातीर्थ में स्नान कर, हरिश्चंद्रेश्वर को प्रणाम करे, वह कभी सत्य से भ्रष्ट नहीं होता।
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