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दिग्गज नेता
– फोटो : अमर उजाला
एक वक्त था, जब आजादी के बाद बुंदेलखंड समेत पूरे देश में कांग्रेस का परचम लहरा रहा था। लगभग सभी सीटों पर दशकों तक कांग्रेस के ही सांसद जीतकर दिल्ली पहुंचते रहे। इसी तरह आज भले ही भाजपा विश्व की नंबर वन पार्टी हो और प्रदेश में डबल इंजन की सरकार चला रही हो, लेकिन सूबे की राजनीति में एक दौर वह भी आया, जब खासतौर पर बुंदेलखंड, क्षेत्रीय दलों का गढ़ बन गया था। पूरे इलाके में समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी का दबदबा था। यह वक्त था साल 1996 से लेकर 2009 तक का। जब इन क्षेत्रीय दलों के धुरंधरों ने भाजपा और कांग्रेस के लड़ाकों के पैर इस कदर उखाड़े कि सांसदी के चुनाव में उन्हें तीसरे और चौथे नंबर से ही संतोष करना पड़ रहा था। बुंदेलखंड में समय के साथ राजनीति ने किस तरह ली करवट नीरज दीक्षित की रिपोर्ट….
बांदा-चित्रकूट लोकसभा सीट
दो बार चिघाड़ा हाथी तो दो बार साइकिल भी दौड़ी
यहां आजादी के बाद 1957,1962 व 1980 का चुनाव कांग्रेस का दबदबा रहा। इसके बाद 1989 में कम्युनिस्ट और राम लहर में 1991 में भाजपा ने भी अपना खाता खोल लिया। इस दौरान क्षेत्रीय दलों सपा व बसपा की भी इंट्री हो चुकी थी। लिहाजा अगले चुनाव 1996 में इस सीट पर हाथी ऐसा चिघाड़ कि सभी दलों के नारे व वादे उसमें दब गए। 1996 के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी से बहुजन समाज पार्टी में आए राम सजीवन ने भाजपा के प्रकाश नारायण को 9,171 वोटों से हराकर जीत दर्ज की। किसी ने सोचा भी नहीं था कि राम लहर में भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ेगा। इसके बाद 1999 के चुनाव में बसपा के ही राम सजीवन ने समाजवादी पार्टी के श्यामा चरण को 28,631 वोटों से परास्त किया। क्षेत्रीय दलों का कारवां यहीं नहीं रुका, अब बारी थी समाजवादी पार्टी की। 2004 के चुनाव में सपा के श्यामाचरण ने बसपा के रामसजीवन को 56,304 वोटों से हराकर संसदीय क्षेत्र में साइकिल दौड़ाई। भाजपा इस चुनाव में तीसरे नंबर पर रही। इसी तरह 2009 के चुनाव में सपा के आरके पटेल ने बसपा के भैरों प्रसाद को 34,593 मतों से पराजित कर गढ़ को मजबूत किया। इस चुनाव में भाजपा की अमिता बाजपेई तीसरे नंबर पर रहीं।
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