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UP Lok Sabha Election 2024
– फोटो : अमर उजाला
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने प्रदेश की आठ सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर खुद को यहां जिंदा रखने की कोशिश की है। हकीकत यह है कि मजदूरों और शोषितों के नाम पर राजनीति करके कभी प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में धाक जमाने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों का वजूद अब यहां खत्म होने जैसा है।
लाल सलाम वाले अधिकतर गढ़ों में भगवा लहरा रहा है। वर्ष 1991 के बाद से भाकपा और माकपा का कोई यूपी में सांसद नहीं बन सका। आर्थिक विसंगतियों को दूर करने की बात करके वामपंथियों ने प्रदेश की औद्योगिक राजधानी रहे कानपुर को अपना गढ़ बनाया।
धार्मिक नगरी अयोध्या में भी वर्चस्व देखने को मिला। बांदा, घोसी, वाराणसी और गाजीपुर में भी वामपंथी यदा-कदा जीते। कानपुर में वर्ष 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हरिहर नाथ शास्त्री सांसद बने। वर्ष 1957 के दूसरे चुनाव में वामपंथियों के समर्थक मजदूर नेता एसएम बनर्जी निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत भी गए।
इसके बाद एसएम बनर्जी अलग-अलग चुनावों में 20 वर्षों तक कानपुर के सांसद रहे। यह अपने आप में वामपंथियों के लिए बड़ी उपलब्धि रही। 1977 में जनता पार्टी के मनोहर लाल ने बनर्जी का विजय रथ रोका। इसके बाद वर्ष 1989 में माकपा की सुभाषिनी अली यहां से सांसद बनीं। अयोध्या से मित्रसेन यादव और घोसी से झारखंडे राय भी सांसद बने। प्रदेश में वामपंथियों के उत्कर्ष का यह आखिरी वर्ष रहा।
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