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उत्तराखंड लोकसभा चुनाव 2024
– फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
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कोशिश भी कर, उम्मीद का रास्ता भी चुन, फिर थोड़ा मुकद्दर तलाश कर… लोकसभा चुनाव की रणभेरी बजते ही ये पंक्तियां उन घोषित और संभावित उम्मीदवारों पर सटीक बैठती हैं, जो मतदाताओं का दिल जीतने की भरसक कोशिश में ताल ठोकेंगे। उम्मीदवार पहाड़ की कठिन चढ़ाई और तराई-भाभर का मैदान मारने की हसरत लिए संसद की राह तलाशने की उम्मीद सजोएंगे।
पांच लोकसभा सीट वाले उत्तराखंड के मतदाता कई मायनों में अपनी अलग पहचान रखते हैं। देश में मतदान प्रतिशत में अव्वल गुजरात के बाद उत्तराखंड दूसरा राज्य रहा है, जो इस बार 75 प्रतिशत मतदान के लक्ष्य को साधकर नया कीर्तिमान गढ़ने को बेताब है। बीते तीन लोकसभा चुनावों के नतीजे देखें तो मतदाताओं ने पांचों लोकसभा सीटों पर एक जैसा फैसला सुनाया है। बीते दो चुनावों 2014 और 2019 में भाजपा के सभी उम्मीदवारों को संसद भेजा। 2009 में ऐसा ही मौका कांग्रेस को दिया था। राज्य गठन से पहले और बाद में कई बार ऐसे मौके भी आए, जब मतदाताओं ने अपनी गढ़ी परिपाटी को एक झटके में तोड़ा भी है।
छोटे राज्य की राजनीतिक सोच और नजरिया लंबे समय से दो दल भाजपा-कांग्रेस के करीब ही रहा है। क्षेत्रीय दलों ने खुद को ज्यादा करीब साबित करने के लिए स्थानीय और भावनात्मक मुद्दों के साथ मजबूत उम्मीदवारों को भी उतारा, लेकिन आम मतदाताओं की अंगुली राष्ट्रीय दलों के बटन पर ही आकर रुकी। हां… 2012 के परिसीमन से पहले और राज्य गठन के बाद 2004 में हरिद्वार से समाजवादी पार्टी के सांसद को भी संसद पहुंचाया।
एक समय ऐसा भी था जब यहां के मतदाता राज्य में एक दल की सरकार बनाते और सांसद दूसरे दल का चुनकर भेजते। 2002 में राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन पांच में तीन सांसद भाजपा के जीते। 2009 में भाजपा की सरकार बनी, लेकिन उसके सभी सांसद उम्मीदवार हार गए। 2014 में राज्य में कांग्रेस की सरकार थी, बावजूद उसके उसका कोई भी उम्मीदवार नहीं जीत सका।
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