विशेषज्ञों की सलाह: मोबाइल की लत से छुटकारा पाने के लिए बच्चों का वास्तविक दुनिया से संवाद ज्यादा जरूरी

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mobile addiction

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– फोटो : सोशल मीडिया

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किताबें पढ़कर, दोस्तों व परिवार से बातचीत करके, इंडोर व आउटडोर खेलों में वक्त बिताकर बच्चों व किशोरों को मोबाइल की लत से निकाला जा सकता है। इसकी आभासी दुनिया से निकलने का यही बेहतर तरीका है। मनोचिकित्सकों ने इन तरीकों से बच्चों व किशोरों को इस लत से बाहर निकालने में कामयाबी भी पाई है। ऐसे पीड़ित अब सामान्य जीवन बिता रहे हैं। 

मसलन, दिल्ली के जनकपुरी का एक दंपत्ति अपने 16 साल के बच्चे के मोबाइल एडिक्शन से परेशान था। उनको कुछ समझ में नहीं आ रहा था। पड़ोसी की सलाह पर वह दक्षिणी दिल्ली के एक अस्पताल में मनोचिकित्सक के पास लेकर गए। यहां पहले दंपत्ति की काउंसलिंग हुई। उसके बाद बेटे की। पहले कुछ दिनों तक तो किशोर झगड़ा करता रहा, लेकिन धीरे-धीरे उसका गुस्सा शांत हुआ और उसने मोबाइल के इस्तेमाल में कमी आई। इस बीच डॉक्टरों ने उसे दवाई भी दी। करीब तीन माह के बाद वह काफी हद तक ठीक हो गया और नियमित स्कूल जाने लगा है।

 

यही कहानी डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोविज्ञान विभाग में पहुंचे 17 साल के किशोर की भी थी। इसने पढ़ाई से दूरी बना ली थी। बात-बात में गुस्सा आ जाता था। यहां पहले अभिभावकों की फिर किशोर की काउंसलिंग शुरू हुई। बार-बार उसे समझाया गया। उनके माता व पिता को कहानियां सुनाने, बच्चे को किताब देने की सलाह दी गई। इसके साथ ही लक्षण के आधार पर दवाईयां भी दीं। उसको योग व ध्यान भी करवाया गया। अब उसके गुस्से पर तेजी से लगाम लगी और उसने फोन के इस्तेमाल को काफी कम कर दिया। फिलहाल किशोर की हालत बेहतर है और वह स्कूल जा रहा है।  

कहानी, मोबाइल के आविष्कारक की जुबानी

मार्टिन कूपर अमेरिका के इंजीनियर हैं। लोगों के संबंधों का दायरा मजबूत करने के लिए उन्होंने मोबाइल का आविष्कार किया। लेकिन अब वह अपने ही आविष्कार से दु:खी हैं। इसकी वजह इसका बहुत ज्यादा होने वाला इस्तेमाल है। एक इंटरव्यू में मार्टिन कूपर ने कहा, वह दिन में बमुश्किल 72 मिनट, यानि 24 घंटे का पांच फीसदी वक्त ही मोबाइल पर बिताते हैं। उनकी सलाह है कि लोगों को मोबाइल ऑफ कर थोड़ी सी अपनी जिंदगी भी जी लेनी चाहिए।

सख्ती से इलाज संभव नहीं
ज्यादा सख्ती से पीड़ित गलत कदम उठा सकता है। उपचार के दौरान नियमित काउंसलिंग की जाती है। ज्यादा से ज्यादा बातचीत की जाती है। जरूरत होने पर दवाएं भी देते हैं। मरीज की बीमारी के आधार पर तीन से छह माह तक उपचार चलता है। इस दौरान माता-पिता को विशेष रूप से संयम रखकर बच्चे को किताबें पढ़ाने, खेलकूद की तरफ जाने के लिए कहा जाता है। ऐसा करने पर पीड़ित में धीरे-धीरे सुधार आने लगता है। एक समय के बाद स्थिति काफी बेहतर हो जाती है और पीड़ित फिर से सामान्य हो जाता है।  -डॉ. विशाल छाबड़ा, अध्यक्ष, दिल्ली साइकेट्रिक सोसाइटी

सामााजिक गतिविधियों से जोड़ना बेहतर
पीड़ित को सामाजिक गतिविधियों से जोड़कर परिवार से बात करने, उनके साथ खेलने व अन्य काम करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे पीड़ित मोबाइल से दूरी बनाने लगते हैं। गंभीर रूप से पीड़ित के लिए मोबाइल इस्तेमाल का समय सीमित कर दिया जाता है। उनके व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए जरूरत के आधार पर दवाई दी जाती है। साथ ही योगासन व ध्यान लगवाया जाता है। छोटे बच्चों को आसान सामान्य योग करवाया जाता है। – डॉ. लोकेश शेखावत, मनोचिकित्सक, डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल

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किताबें पढ़कर, दोस्तों व परिवार से बातचीत करके, इंडोर व आउटडोर खेलों में वक्त बिताकर बच्चों व किशोरों को मोबाइल की लत से निकाला जा सकता है। इसकी आभासी दुनिया से निकलने का यही बेहतर तरीका है। मनोचिकित्सकों ने इन तरीकों से बच्चों व किशोरों को इस लत से बाहर निकालने में कामयाबी भी पाई है। ऐसे पीड़ित अब सामान्य जीवन बिता रहे हैं। 


मसलन, दिल्ली के जनकपुरी का एक दंपत्ति अपने 16 साल के बच्चे के मोबाइल एडिक्शन से परेशान था। उनको कुछ समझ में नहीं आ रहा था। पड़ोसी की सलाह पर वह दक्षिणी दिल्ली के एक अस्पताल में मनोचिकित्सक के पास लेकर गए। यहां पहले दंपत्ति की काउंसलिंग हुई। उसके बाद बेटे की। पहले कुछ दिनों तक तो किशोर झगड़ा करता रहा, लेकिन धीरे-धीरे उसका गुस्सा शांत हुआ और उसने मोबाइल के इस्तेमाल में कमी आई। इस बीच डॉक्टरों ने उसे दवाई भी दी। करीब तीन माह के बाद वह काफी हद तक ठीक हो गया और नियमित स्कूल जाने लगा है।

 

यही कहानी डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोविज्ञान विभाग में पहुंचे 17 साल के किशोर की भी थी। इसने पढ़ाई से दूरी बना ली थी। बात-बात में गुस्सा आ जाता था। यहां पहले अभिभावकों की फिर किशोर की काउंसलिंग शुरू हुई। बार-बार उसे समझाया गया। उनके माता व पिता को कहानियां सुनाने, बच्चे को किताब देने की सलाह दी गई। इसके साथ ही लक्षण के आधार पर दवाईयां भी दीं। उसको योग व ध्यान भी करवाया गया। अब उसके गुस्से पर तेजी से लगाम लगी और उसने फोन के इस्तेमाल को काफी कम कर दिया। फिलहाल किशोर की हालत बेहतर है और वह स्कूल जा रहा है।  


कहानी, मोबाइल के आविष्कारक की जुबानी

मार्टिन कूपर अमेरिका के इंजीनियर हैं। लोगों के संबंधों का दायरा मजबूत करने के लिए उन्होंने मोबाइल का आविष्कार किया। लेकिन अब वह अपने ही आविष्कार से दु:खी हैं। इसकी वजह इसका बहुत ज्यादा होने वाला इस्तेमाल है। एक इंटरव्यू में मार्टिन कूपर ने कहा, वह दिन में बमुश्किल 72 मिनट, यानि 24 घंटे का पांच फीसदी वक्त ही मोबाइल पर बिताते हैं। उनकी सलाह है कि लोगों को मोबाइल ऑफ कर थोड़ी सी अपनी जिंदगी भी जी लेनी चाहिए।


सख्ती से इलाज संभव नहीं

ज्यादा सख्ती से पीड़ित गलत कदम उठा सकता है। उपचार के दौरान नियमित काउंसलिंग की जाती है। ज्यादा से ज्यादा बातचीत की जाती है। जरूरत होने पर दवाएं भी देते हैं। मरीज की बीमारी के आधार पर तीन से छह माह तक उपचार चलता है। इस दौरान माता-पिता को विशेष रूप से संयम रखकर बच्चे को किताबें पढ़ाने, खेलकूद की तरफ जाने के लिए कहा जाता है। ऐसा करने पर पीड़ित में धीरे-धीरे सुधार आने लगता है। एक समय के बाद स्थिति काफी बेहतर हो जाती है और पीड़ित फिर से सामान्य हो जाता है।  -डॉ. विशाल छाबड़ा, अध्यक्ष, दिल्ली साइकेट्रिक सोसाइटी

सामााजिक गतिविधियों से जोड़ना बेहतर

पीड़ित को सामाजिक गतिविधियों से जोड़कर परिवार से बात करने, उनके साथ खेलने व अन्य काम करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे पीड़ित मोबाइल से दूरी बनाने लगते हैं। गंभीर रूप से पीड़ित के लिए मोबाइल इस्तेमाल का समय सीमित कर दिया जाता है। उनके व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए जरूरत के आधार पर दवाई दी जाती है। साथ ही योगासन व ध्यान लगवाया जाता है। छोटे बच्चों को आसान सामान्य योग करवाया जाता है। – डॉ. लोकेश शेखावत, मनोचिकित्सक, डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल



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