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संवाद
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
जम्मू-कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर ( पीओजेके) के विस्थापितों की मांग है कि लद्दाख स्काउट्स की तरह पुंछ, मीरपुर तथा मुजफ्फराबाद स्काउट्स का गठन किया जाए। इन तीनों स्काउट्स में वहां के विस्थापितों को रखा जाए जो सरहद की रक्षा में मददगार साबित होंगे, क्योंकि सीमा पार से घुसपैठ करने वालों की भाषा को वह बेहतर तरीके से तरीके से समझ सकते हैं।
अमर उजाला संवाद में शामिल हुए पीओजेके विस्थापितों का कहना था कि उन्हें राजनीतिक रूप से सशक्त बनाए जाने के लिए विधानसभा में पीओजेके के लिए आरक्षित 24 सीटों में से आठ पर नुमाइंदगी का मौका दिया जाना चाहिए। पहाड़ी भाषी का प्रमाणपत्र देकर उन्हें आरक्षण का लाभ भी दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही 2014 में उमर सरकार में पारित कैबिनेट के फैसले को भी लागू किया जाए जिसमें प्रमुख रूप से साढ़े आठ हजार पदों पर भर्ती करने का प्रस्ताव पारित किया गया था। कश्मीरी पंडितों की तरह उन्हें भी सुविधाएं मिलें और उनकी सुध ली जाए। बच्चों को तकनीकी शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ मिले।
वाधवा आयोग की सिफारिश को लागू किया जाए
आए दिन सीमा पार से घुसपैठ होती है। सबसे ज्यादा घुसपैठ पुंछ, मुजफ्फराबाद और मीरपुर वाले इलाके से होती है। हमने सरकार को सुझाव दिया था कि लद्दाख स्काउट की तरह पुंछ, मुजफ्फराबाद और मीरपुर स्काउट का गठन हो और इनमें पीओजेके विस्थापित युवाओं को भर्ती कर इन क्षेत्रों से लगती एलओसी पर तैनात किया जाए। हम आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देंगे। वाधवा आयोग ने अपनी सिफारिश में पीओजेके विस्थापितों के लिए आठ सीट रखने को कहा था, उसे लागू किया जाए। इससे हमारा प्रतिनिधित्वि होगा और हम अपनी बात रख सकेंगे। पीओजेके विस्थापित पहाड़ी भाषा बोलने वाले लोग हैं, लेकिन शहरों में रहने वाले लोगों को पहाड़ी प्रमाणपत्र नहीं दिया जा रहा है। – राजीव चुन्नी, चेयरमैन, एसओएस इंटरनेशनल
कैंपों में बुनियादी सुविधा के नाम पर कुछ नहीं
विस्थापन को 75 साल को गए हैं, लेकिन सरकार की तरफ से मदद के नाम पर 5.50 लाख रुपये मिले हैं। सरकार की नीतियों से लगता है कि हमारे साथ खेल खेला जा रहा है। पीओजेके विस्थापित 39 कैंपों में रह रहे हैं, जहां बुनियादी सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है। जहां से हम विस्थापित होकर आए हैं, वहां हम एक बड़ी संपत्ति के मालिक थे। हमारे साथ भेदभाव को कम किया जाए। – विनोद कुमार दत्ता, पीओजेके विस्थापित
हमारा दर्द किसी भी विस्थापितों से कहीं ज्यादा
पीओजेके विस्थापितों की दर्द अन्य किसी भी विस्थापितों से ज्यादा है। सरकार को यह समझना चाहिए कि हमने पाकिस्तान को ठुकरा कर भारत को चुना है। हम पांचवीं पीढ़ी में हैं, लेकिन आज भी हमारे बच्चों को न बेहतर शिक्षा और न ही रोजगार है। 30 लाख रुपये प्रति परिवार को देने का फैसला हुआ था, जिसमें से 10 साल में 5.50 लाख रुपये ही मिले हैं। – जगजीत सिंह
विस्थापितों में भेदभाव करने से होता है दर्द
हम विस्थापन का दर्द और दंश को समझते है। ऐसे में हमें किसी अन्य विस्थापितों को दी जा रही सुविधाओं से परेशानी नहीं है, लेकिन जब सरकार विस्थापितों में भेदभाव करती है तो दर्द होता है। कश्मीरी पंडितों से हमारी हमदर्दी है, लेकिन सरकार जिस तरह से उन्हें सुविधाएं दे रही है उसी तरह की सुविधाओं के हम भी हकदार है। -गौरी शंकर
कनीकी शिक्षा में हमारे बच्चों के लिए हो विशेष प्रावधान
विस्थापन का दंश ऐसा है कि 75 साल बाद भी हमारे युवाओं के पास सरकारी नौकरी नहीं है। हमारे बच्चे शिक्षित तो हो जाते हैं, लेकिन रोजगार नहीं होता। तकनीकी शिक्षा में हमारे बच्चों की संख्या न के बराबर है। सरकार तकनीकी शिक्षा में हमारे बच्चों के लिए विशेष प्रावधान रखे, ताकि वह कुशल बन सकें। सरकार जिस तरह कश्मीरी पंडितों को विस्थापित मानती है और उन्हें हर सुविधा दे रही है, उसी तरह हमें भी सुविधाएं दी जाएं। – तिलक राज सेठी
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