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बीते दो साल से अस्वस्थ होने के चलते हाता परिसर में ही रहते थे, लेकिन गोलघर घूमना नहीं छोड़ते थे। कुछ दिन नागा होने पर कह ही देते- हमें गोलघर घुमा द। उनके बड़े बेटे भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी कुछ लोगों के साथ उन्हें गोलघर की ओर गाड़ी से भेजते थे।
पूर्व जिला पंचायत सदस्य बसंत पासवान ने कहा कि पंडित जी क्षेत्र के विकास को लेकर संजीदा थे। जब गांवों में पगडंडी होती थी, तब चिल्लूपार में सड़कें बन गई थीं। पानी की टंकियां थीं और लोगों के घरों तक पानी की आपूर्ति होती थी। कछार क्षेत्र में उन्होंने विकास के मामले में कोई कोताही नहीं बरती। हमेशा सरकार में मंत्री थे, तो क्या मजाल उनकी बातों को कोई टाल दे। हर सप्ताह गांव में गुजारते थे। लोगों से मिलना-जुलना बना रहता था। क्षेत्र का कोई व्यक्ति लखनऊ में उनके आवास पर चला जाता था तो बिना भोजन कराए जाने नहीं देते थे।
पूर्व ब्लॉक प्रमुख एवं पूर्व मंत्री के करीबी राज बहादुर सिंह ने कहा कि वर्ष 1998 में चिल्लूपार में प्रलयंकारी बाढ़ आई थी। क्षेत्र की जनता परेशान थी। गांवों में लोग फंसे थे और मदद की गुहार लगा रहे थे। पंडित जी ने सीधे मुख्यमंत्री को फोन कर बचाव कार्य के लिए संसाधन मुहैया कराने की मांग की। चारों तरफ सड़क मार्ग बंद था। इलाहाबाद से हेलिकाप्टर से नेवादा गांव में नाव पहुंचाई गई। स्टीमर से पंडित जी बाढ़ से घिरे गांव गायघाट पहुंचे। इसी दौरान उन्होंने एक व्यक्ति को बाढ़ में डूबते देखा तो खुद को रोक नहीं पाए। स्वयं नदी में उतरने का प्रयास करने लगे, लेकिन साथ में मौजूद लोगों ने रोक दिया। फिर उनके साथ स्टीमर में मौजूद एक युवक ने डूबने वाली की जान बचाई। यह पंडित जी की जीवटता थी, जो दूसरों से अलग करती थी। उनका लगाव क्षेत्र के लोगों के प्रति ज्यादा था, इसलिए सबके प्रिय थे।
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