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जैविक खाद(प्रतीकात्मक)
– फोटो : सोशल मीडिया
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मात्र 10 रुपये से शुरुआत.. फिर खुशहाली। पिछले कुछ वर्षों में अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से प्रदेश की मिट्टी और किसानों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। अब किसान दस रुपये प्रति किलो की लागत से जैविक उर्वरक बना पाएंगे। बाजार में फिलहाल उर्वरकों की न्यूनतम कीमत 190 रुपये प्रति किलोग्राम है, जो किसानों के लिए बहुम महंगी है। हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक अश्विनी तपवाल ने बताया कि शोध से पता चला है कि किसान माइकोराइजा फंगस के इस्तेमाल से गमलों में कल्चर की शुरुआत कर सकते हैं और केवल दस रुपये से खुद अच्छे उर्वरक बना सकेंगे।
उन्होंने बताया कि माइकोराइजा फंगस और पौधों की जड़ों के बीच एक सहजीवी संबंध है, जो पोषक तत्वों के अवशोषण और समग्र पौधों के स्वास्थ्य को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कृषि के क्षेत्र में माइकोरिज़ल फंगस का उपयोग जैव उर्वरक बनाने के लिए किया जाता है। किसान पैधों के साथ माइकोराइजा का कल्चर डाल सकते हंै। माइकोराइजा जड़ों से मिलकर एक नेटवर्क बनाता है।
जैविक उर्वरक व्यापक नेटवर्क बनाने की फंगस की क्षमता का लाभ उठाते हैं जिसे हाइपहे के रूप में जाना जाता है। येपौधे की जड़ तक पहुंच बढ़ाता है, जिससे पानी, फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्वों को ग्रहण करने में सुविधा होती है।
किसान पहला कल्चर दस रुपये में फंगस खरीद कर गमलों में डाल कर बना सकते हैं। एक कल्चर बनने में तीन महीने का समय लगता है। तीन महीने के बाद पौधे के निकलने के बाद भी उर्वरक मिट्टी में रहते हैं। थोड़ी मिट्टी को फैला कर इसे खाद की तरह इस्तेमाल करके किसान पूरी जमीन को माइकोराइजा से भर सकते हैं। फिर फसल उगाने पर फंगस फिर सक्रिय हो जाते हैं और पौधों को पोषण देना शुरू कर देते हैं। किसानों को माइकोराइजा की कोई अतिरिक्त देखबाल करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि माइकोराइजा फंगस पोषक तत्वों के अधिग्रहण में सहायता करते हुए पौधे से पोषण प्राप्त करते हैं। इससे ना ही फसल को कोई नुकसान होता है और ना ही पर्यावरण को। यह स्वस्थ पौधों के विकास, फसल की पैदावार में वृद्धि और पारिस्थितिक स्थिरता को बढ़ावा देता है। संवाद
रासायनिक उर्वरक के नुकसान
रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी के पोषक तत्व कम हो जाते हैं, प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र बाधित होता है और लाभकारी जीवों को नुकसान पहुंचता है। खेतों से निकलने वाले पानी से जल स्रोत भी प्रदूषित हो सकते हैं। धीरे-धीरे मिट्टी भी बंजर होती है।
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