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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
– फोटो : अमर उजाला
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि अस्थायी कर्मचारी को बर्खास्त करने के लिए भी नियमों का पालन करना जरूरी है। न्यायाधीश सत्येन वैद्य ने अपने निर्णय में कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 के प्रावधान अस्थायी कर्मचारी को सांविधानिक गारंटी देते हैं। यह प्रावधान नियमित और अस्थायी कर्मचारियों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव का संकेत नहीं देते हैं। अदालत ने अस्थायी वन रक्षक की बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए यह निर्णय सुनाया। याचिकाकर्ता ललिता जिंदल की सेवाओं को नियमों के विरुद्ध समाप्त करने को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता को 28 फरवरी 1986 को वन रक्षक के पद पर नियुक्त किया गया था। पारिवारिक समस्या के कारण उसने 7 से 9 अगस्त 1995 को छुट्टी ली थी।
सांस की तबीयत ज्यादा खराब होने के कारण उसने अपनी छुट्टी को बढ़ाने के लिए टेलीग्राम के माध्यम से आग्रह किया। 30 अप्रैल 1996 तक अनुपस्थित रहने के कारण उसकी सेवाओं को समाप्त कर दिया गया। अदालत ने पाया कि सेवाओं को समाप्त करते समय केंद्रीय सिविल सेवा नियमों का पालन नहीं किया गया। इन नियमों के तहत याचिकाकर्ता की सेवाओं को समाप्त करने से पहले एक महीने का नोटिस दिया जाना वांछित था। नियम 5 में स्पष्ट किया है कि अस्थाई कर्मचारी को व्यक्तिगत तौर पर या पंजीकृत डाक के माध्यम से दिया जाना था। नोटिस स्वीकृत न होने की स्थिति में इसे राजपत्र में प्रकाशित किया जाना था। अदालत ने पाया कि विभाग ने याचिकाकर्ता की सेवाएं समाप्त करने से पहले नियमों का पालन नहीं किया। अदालत ने अस्थायी वन रक्षक की बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के मामले पर कानून के अनुसार निर्णय लिया जाए।
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