[ad_1]

कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर
– फोटो : अमर उजाला
ख़बर सुनें
विस्तार
कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर अब महत्वपूर्ण फसलों के साथ पारंपरिक गहनों का भी जीआई (भौगोलिक संकेत) करवाने का प्रयास करेगा। इससे अब गद्दी समुदाय की महिलाओं में पहने जाने वाले पारंपरिक गहनों की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहचान होगी। इनमें कुछ गहनों को छोड़ यह खास मौकों पर ही पहने जाते हैं। इसे लेकर कृषि विवि ने प्रयास शुरू कर दिए हैं। प्रदेश की कई महत्वपूर्ण और पारंपरिक फसलों के जीआई मिलने से किसानों को आर्थिक तौर पर लाभ होगा। कृषि विवि के कुलपति प्रो. एचके चौधरी ने कहा कि प्रदेश की फसलों के साथ पारंपरिक गहनों को लेकर भी जीआई प्राप्त की पहल की जा रही है। फसलों और उत्पादों के अन्य मालिकों को इन विशिष्ट उत्पादों पर विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं। इन्हें बेचकर भरपूर लाभ होता है।
हिमाचल के भरमौर, बरोट और किन्नौर के राजमा, करसोग, शिलाई और चंबा क्षेत्र की उड़दबीन, करसोग की कुल्थी, कुल्लू, कांगड़ा और मंडी क्षेत्र के लाल चावल, चंबा की चुख, चंबा के प्राचीन आभूषण, जानवरों की नस्लें और उनके उत्पाद आदि को भौगोलिक संकेत (जीआई) के लिए चुना गया है। गद्दी समुदाय के महिलाओं के अनूठे पारंपरिक आभूषण चाक और चिड़ी, चंद्रहार और चंपाकली, लौंग, कोका, तिल्ली और बालू, बुंदे, झुमके, कांटे, लटकनी, तुंगनी और कनफुल, गोजरू, टोके, कंगनू, स्नंगु, सिंघी और परी और भरमौर क्षेत्र से सफेद शहद जैसे औषधीय उत्पाद, लाहौल-स्पीति और किन्नौर से एफिड्स हनी ड्यू, जंगली मशरूम (कीड़ाजड़ी), स्पीति छरमा और ऊनी उत्पाद जैसे चारखानी पट्टू, डोहरू, पूडे और चीगू बकरी से पश्मीना आदि को जीआई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
[ad_2]
Source link