Lok Sabha Election: मायावती बिगाड़ने वाली हैं इन पार्टियों का सियासी गणित, इस तरह दांव लगाने की है तैयारी

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Lok Sabha Election: Mayawati is going to spoil the political calculations of samajwadi party, congress and BJP

Lok Sabha Elction: Mayawati
– फोटो : Amar Ujala/ Rahul Bisht

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लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने कुछ इस तरह गोटियां सेट की हैं, जिससे कई लोकसभा सीटों पर सियासी गणित ही बिगड़ गया है। दरअसल मायावती ने अब तक जितने प्रत्याशी मैदान में उतरे हैं, वे सब सोशल इंजीनियरिंग के नजरिए से पार्टी को फायदेमंद नजर आ रहे हैं। राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि मायावती ने कई सीटों पर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के मिशन 80 वाले सियासी रथ को रोकने का इंतजाम शुरू कर दिया है। हालांकि बहुजन समाज पार्टी के नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले साथ-साथ दलितों, मुसलमानों और पिछड़ों को लेकर ही पूरी योजना बना रही है।

बहुजन समाज पार्टी ने अब तक उत्तर प्रदेश में अब तक 25 सीटों पर लोकसभा प्रत्याशी उतारे हैं। इसमें आठ सवर्ण, सात मुसलमान और तीन ओबीसी प्रत्याशी हैं। जबकि सात सुरक्षित सीटों पर अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों को मैदान में उतारा गया है। बहुजन समाज पार्टी के इन 25 सीटों वाले सियासी समीकरणों के आधार पर उसकी आगे की रणनीति स्पष्ट दिख रही है। बहुजन समाज पार्टी के वरिष्ठ नेता डीडी चौधरी कहते हैं कि उनकी पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने अब तक जिस तरीके से टिकट दिए हैं, यही ट्रेंड आने वाली सीटों पर ही दिखने वाला है। उनका कहना है कि जो लोग बहुजन समाज पार्टी की सियासत को कमजोर मानकर चल रहे हैं, उनकी यह गलतफहमी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची के साथ दूर हो जानी चाहिए। पार्टी के नेताओं का मानना है कि भले ही बहुजन समाज पार्टी के कई प्रत्याशियों के नाम सियासत में बिलकुल नए लगें,लेकिन उनकी पार्टी इस बार बगैर गठबंधन के ज्यादा सीटें जीतने वाली है।

सियासी जानकारों के मुताबिक दरअसल बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरीके से प्रत्याशी उतारे हैं, वह न सिर्फ सपा-कांग्रेस गठबंधन बल्कि भाजपा के मिशन 80 के राह में बड़ा रोड़ा बन सकती है। वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु श्रीवास्तव कहते हैं कि बसपा ने मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी उतार कर दलित मुस्लिम समीकरण साधे हैं। जबकि कैराना जैसी सीट पर सवर्ण, ओबीसी और दलितों की मिली जुली आबादी के चलते ही सवर्ण प्रत्याशी मैदान में उतारकर सियासी गठजोड़ को साधा है। कैराना में तकरीबन एक तिहाई मुसलमान वोटर भी हैं। हिमांशु कहते हैं कि बहुजन समाज पार्टी ऐसी कई सीटों पर अपने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को लागू करते हुए अन्य राजनीतिक दलों की सियासी जमीन को प्रभावित करने की रणनीति पर आगे बढ़ी है।

राजनीतिक जानकार प्रद्युम्न प्रकाश कहते हैं कि बहुजन समाज पार्टी ने इस बार जिस तरीके से प्रत्याशियों का चयन किया है, वह जातिगत समीकरणों के आधार पर बड़ा खेल बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है। उनका कहना है कि जिस तरह से मुजफ्फरनगर सीट पर बसपा ने पिछड़े वर्ग के दारा सिंह प्रजापति को मैदान में उतारा है, वह इस सीट पर दलित और ओबीसी के मजबूत सियासी समीकरण को देखकर ही दांव चला गया है। जबकि इसी सीट पर भाजपा और समाजवादी पार्टी ने जाट प्रत्याशियों पर दांव लगाया है। इसी तरह मेरठ में भी बसपा ने देवव्रत त्यागी को प्रत्याशी बनाकर सोशल इंजीनियरिंग की एक चाल को और आगे बढ़ाया है।

बहुजन समाज पार्टी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक अभी जो सीटें और भी आनी हैं, उसमें इसी तरीके का जातीयता का समीकरण दिखने वाला है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर इस तरीके के सियासी समीकरण बाकी सीटों पर भी दिखते हैं, तो अन्य राजनीतिक दलों के लिए लड़ाई मजबूत हो जाएगी। दरअसल बसपा ने इस लोकसभा चुनाव में अपनी सोशल इंजीनियरिंग के चलते सीटों का बंटवारा किया है।

 




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