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अलीगढ़ के लड्डू गोपाल
– फोटो : अमर उजाला
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अलीगढ़ में श्रावण मास के साथ बाजार में त्योहारी तैयारी शुरू हो गई है। मूर्ति कारोबारियों ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि अधिकमास के चलते अभी आर्डर कम हैं। विदेशी मांग को ध्यान में रखते हुए कारोबारी लड्डू-गोपाल बनाने भेजने की तैयारी में लग गए हैं। शहर में बने लड्डू गोपाल देश के साथ-साथ दूसरे मुल्कों में भी जाते हैं। दस करोड़ से अधिक के विदेशी ऑर्डर का अनुमान लगाया जा रहा है।
ब्रास (कापर, पीतल व जस्ता मिक्स) निर्मित यह मूर्ति अलीगढ़ की पहचान है। ताला कारोबार के साथ ही आजादी के पहले से यहां ढलाई के जरिये पीतल की मूर्ति बनाने का काम चल रहा है। पहले मूर्तियां बनाकर छोटे-छोटे व्यापारी दिल्ली के बाजार में खुद ही बेचने जाया करते थे। मगर पिछले पांच दशक से यह कारोबार तेजी से बढ़ा है। यहां की मूर्ति की खास पहचान है, जो अंदर से खोखली होती है। इसको वेल्डिंग के साथ बनाया जाता है। इससे उल्ट दक्षिण भारत में ठोस मूर्ति बनाई जाती हैं, जो वजनी और कीमती भी होती है। पीतल नगरी मुरादाबाद के कारोबारी भी यहां से मूर्ति बनवाकर मंगाते हैं। शहर के सासनी गेट, जयगंज, सराय भूखी, भुजपुरा, पला रोड, बिहारी नगर व उनसे सटे आसपास के इलाकों में यह कुटीर उद्योग है। किसी घर में ढलाई, किसी में पॉलिश, किसी में चिताई, किसी में वेल्डिंग का काम मजदूरी पर होता है। शहर के सासनी गेट इलाके में कई मुस्लिम परिवारों में भी ये मूर्तियां बनाई जाती हैं।
ऐसे बनती है मूर्ति
यहां पीतल की चादर या सिल्ली की दो तरह से मूर्ति बनती हैं। जिसकी पहले मिट्टी के सांचे में ढलाई होती है। फिर उसके टुकड़ों को वेल्डिंग के जरिये जोड़ा जाता है। इसके बाद सबसे महीन काम चिताई के जरिये स्वरूप गढ़ा जाता है। इसके बाद पॉलिश से इसको चमकाया जाता है।
यहां तक सप्लाई
दिल्ली, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट, कर्नाटक के अलावा मुरादाबाद, मथुरा, वृंदावन में सर्वाधिक आपूर्ति होती है। ऑनलाइन प्लेटफार्म पर भी मूर्तियां बिक रही हैं। कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस में रहने वाले भारतीयों के बीच इनकी मांग है। देश विदेश में इस्कान मंदिरों के स्टालों पर भी इनकी आपूर्ति है।
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