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“तेजस्वी के लिए तड़पता बिहार” पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा।
– फोटो : अमर उजाला
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राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के पटना स्थित मुख्यालय के बाहर अब एक बड़ा-सा बोर्ड लगाया है। लिखा है- “तेजस्वी यादव के लिए तड़पता बिहार”। तेजस्वी यादव बिहार के मौजूदा उप मुख्यमंत्री हैं तो यह तड़प क्यों? जाहिर है सीधे कमान मिलने की। तेजस्वी भी राजद कार्यालय आए तो बोर्ड देखते गए। राजद कार्यालय से कुछ ही दूरी पर सामने की तरफ जनता दल यूनाईटेड (JDU) का मुख्य कार्यालय है। इसके अंदर-बाहर अक्सर यह आवाज गूंजती है- “देश का पीएम कैसा हो, नीतीश कुमार जैसा हो।” जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह यूपी दौरे के दौरान दुहरा चुके हैं कि देश में विपक्षी एकता के सूत्रधार नीतीश कुमार हैं। ऐसे में यह सवाल जायज है कि जदयू-राजद की आखिर मंजिल क्या है और दोनों दल इस दिशा में कहां तक बढ़े हैं?
आज बोर्ड के बहाने जानें कि राजद कहां है
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब भारतीय जनता पार्टी के साथ जनादेश लेकर राजद का दामन थामा था, उसी दिन से आवाज उठ रही कि तेजस्वी को बागडोर मिल जाए। राजभवन के पास तब इसकी नारेबाजी भी लगी थी। वह कसक बार-बार किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाती है। ताजा पोस्टर उस कसक को तड़प में दिखा रहा, यह कहना भी गलत नहीं होगा। तो, क्या राजद या तेजस्वी उस राह पर हैं? कुछ मायनों में जरूर हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो काफी समय से इस कुर्सी पर हैं, लेकिन जिस तरह पिछले 8-10 महीनों से राज्य सरकार नौकरियों पर फोकस कर रही है, उसे राजद अपने खाते की उपलब्धि बताने से कभी नहीं हिचकता। मंगलवार को भी तेजस्वी ने भाजपा पर वार करते हुए एक बार फिर दुहराया कि इतनी नौकरियां कहीं और नहीं दी जा रही है। नौकरियां तेजस्वी के एजेंडे में 2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी थी और अब अगर राजद या तेजस्वी यह क्रेडिट लेकर युवा पीढ़ी से समर्थन हासिल कर रहे तो अजूबा भी नहीं। रोजगार और बेरोजगारी में पलायन बिहार का सबसे बड़ा मुद्दा रहा है और इस नजरिए से देखें तो तेजस्वी इस मामले में आगे बढ़ते दिख रहे हैं। इसके अलावा, जिस तरह से लालू प्रसाद यादव दोबारा बिहार की राजनीति में प्रभावी हुए हैं, यह कहना भी गलत नहीं कि सर्वाधिक विधायकों वाला राजद विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी जदयू से कई मामलों में आगे है। इन सभी के साथ जातिगत जनगणना के आंकड़ों में यादव जाति की संख्या को देखते हुए भी तेजस्वी यादव को लेकर राजद की तड़प वाजिब नजर आती है।
संयोजक नहीं, सूत्रधार सही तो जदयू कहां है
23 जून को देशभर के भाजपा विरोधी दलों को पहली बार जुटाने में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्राथमिक भूमिका रही थी। पहली बैठक से ही यह उम्मीद की जा रही थी कि उन्हें विपक्षी एकता का संयोजक बनाया जाएगा। संयोजन की बात कई नेताओं ने कही, लेकिन संयोजक पद के लिए नाम प्रस्तावित नहीं हुआ। बाकी बातें बात में घोषित हो गईं, लेकिन यह पद अब भी खाली है। इधर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राष्ट्रीय स्तर पर अपनी दखल लगातार बढ़ा रहे हैं। खेल के क्षेत्र में भारत की उपलब्धि हो या जी20 बैठक के भोज में उपस्थिति, नीतीश कुमार कहीं पीछे नहीं रह रहे हैं। विपक्षी दलों के इंडी एलायंस की इधर बैठक नहीं हो रही है तो वह इसके लिए चिंतित भी दिख रहे हैं। दूसरे राज्यों के चुनावों पर भी नजर रख रहे हैं। मतलब, कुल मिलाकर दिल्ली कूच की तैयारी है। इसी तैयारी के कारण एक बार फिर ललन सिंह ने उन्हें विपक्षी एकता का सूत्रधार कहा। लेकिन, सवाल यह है कि वह राजद की तड़प को खत्म कर कुर्सी छोड़ दिल्ली जाएंगे? चाणक्य स्कूल ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा इस सवाल पर सीधे कहते हैं- “असंभव है। नीतीश अनिश्चितता की ओर नहीं कूदेंगे। हां, अगर पहले से इंडी एलायंस उनके नाम की घोषण करे तो ऐसी संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता है।”
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