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जब जीवित थी सलोनी, तब भी नहीं ली किसी ने सुध।
– फोटो : अमर उजाला
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विधायक से मुख्यमंत्री तक सवाल उठाए जाने पर मीडिया को दोष दे रहे हैं, लेकिन आज फिर एक सवाल पूरे सरकारी सिस्टम पर चोट करता हुआ आगे बढ़ रहा है। एक युवती की मौत हुई। वह बिहार पुलिस में दारोगा बनकर आमजन की सुरक्षा में तैनात होती, लेकिन परीक्षा देने आयी तो मोबाइल छिनतई के दौरान अपराधियों ने उसे ट्रेन से फेंक दिया। फिर सरकारी इलाज ने उसे जहां-तहां फेंका। न मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मातहत पुलिस विभाग ने तत्परता दिखाई और न उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के स्वास्थ्य विभाग ने संजीदगी। हर कदम पर वह जिंदगी के लिए जूझती हुई शुक्रवार को दुनिया से विदा हो गई। हद तब भी नहीं टूटी। उसकी लाश से भी सरकारी अस्पताल को बख्शीश चाहिए थी। पिता ने वह बख्शीश देकर पोस्टमार्टम हाउस से लाश छुड़ाई और आखिरकार सपनों को ‘शव वाहन’ में लादकर लेते गए।
मोबाइल और पर्स छीनने के क्रम में ट्रेन से दिया धक्का
मृतका सलोनी पूर्वी चंपारण के पलनवा थाना के उंचीडीह गांव की रहने वाली थी। रविवार की सुबह वह भर्ती परीक्षा देने के लिए मोतिहारी निकली थी। वह रक्सौल-मुजफ्फरपुर मेमो से सुगौली स्टेशन पहुंची थी। फिर वह किसी काम से स्टेशन पर उतरी, लेकिन जब वापस ट्रेन पर चढ़ने लगी। इसी दौरान कुछ बदमाश लडकों ने उसका मोबाइल और पर्स छीन लिया और सलोनी को ट्रेन से धक्का दे दिया, जिससे वह ट्रेन के नीचे गिर पड़ी। इस घटना में उसका एक पैर और एक हाथ कट गये। इसके अलावे उसे शारीर के विभिन्न अंगों के साथ साथ सिर में गंभीर चोट लगी। आननफानन में रेलवे पुलिस घायल सलोनी को मोतिहारी के एक प्राइवेट अस्पताल ले गई। वहां प्राथमिक इलाज कर चिकित्सकों ने बेहतर इलाज के लिए उसे सदर अस्पताल भेज दिया। अस्पताल के चिकित्सकों ने उसको फिर सदर अस्पताल से पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर कर दिया गया।
सरकारी सिस्टम ने ले ली जान
सलोनी को लेकर उसके परिजन रविवार दोपहर 12 बजे पटना मेडिकल कॉलेज (PMCH) पहुंचे। उसके पिता ने कहा कि ट्रैक पर आने के बाद सलोनी की जान तो बच गई, लेकिन पटना में इलाज के नाम पर हुए सरकारी सिस्टम की लापरवाही ने उसकी जान ले ली।
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