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मां पूर्णागिरि देवी। संवाद
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नेपाल सीमा से लगे पहाड़ी जिले चंपावत में टनकपुर से 22 किलोमीटर दूर पूर्णागिरि देवी का दरबार आस्था का अनोखा धाम है। साढ़े पांच हजार फीट की ऊंचाई पर एक छोटी सी पहाड़ी पुण्यगिरि (पवित्र पहाड़ी) पर स्थित देवी की धरती इस देवभूमि की प्रमुख धार्मिक धरोहरों में से एक है।
देवी मां अपने भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं। देशभर से हर साल 30 लाख से अधिक श्रद्धालु देवी धाम तक पहुंचते हैं। सबसे ज्यादा श्रद्धालु नवरात्र पर उमड़ते हैं। मंदिर समिति के अध्यक्ष पंडित किशन तिवारी का कहना है कि 22 मार्च से शुरू होने वाले नवरात्र की तैयारी पर बारिश से चिंता की लकीरें बढ़ी हैं।
शिव महापुराण के अनुसार कनखल में मां सती के पिता राजा दक्ष प्रजापति ने महायज्ञ में अपनी पुत्री सती के पति भगवान शंकर को न्योता नहीं दिया। पति के इस अपमान से क्रोधित सती यज्ञ स्थल पहुंचीं और अपमान का प्रतिकार करते हुए यज्ञ के हवन कुंड में कूद कर सती हो गईं।
रौद्र रूप में आए भगवान शंकर अपनी पत्नी सती के शव को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। शंकर के इस रूप को देखकर देवी-देवताओं में भय फैल गया। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। मान्यता है कि मां सती के अंग जहां-जहां गिरे वहां कालांतर में शक्तिपीठ स्थापित हो गए।
यहां पुण्य शिखर पर देवी सती की नाभि गिरी थी इस कारण मां पूर्णागिरि शक्तिपीठ को देवी सती की नाभि स्थली के रूप में भी माना जाता है। पूर्णागिरि देवी में शीश नवाने के बाद सिद्ध बाबा के दर्शन की भी मान्यता है। सिद्ध बाबा का मंदिर शारदा नदी के पार ब्रहमदेव में सिद्धमणि पर्वत पर है।
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