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उपराज्यपाल वीके सक्सेना
– फोटो : अमर उजाला
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शराब के बाद अब स्वास्थ्य विभाग में गड़बड़ी को लेकर दिल्ली सरकार के खिलाफ तलवार लटकती दिखाई दे रही है। दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने दिल्ली सरकार के अस्पतालों और मोहल्ला क्लीनिकों में कुछ जीवन रक्षक दवाओं सहित गैर-मानक दवाओं की खरीद और आपूर्ति की सीबीआई जांच की सिफारिश की है। दिल्ली विभाग के स्वास्थ्य विभाग के तहत केंद्रीय खरीद एजेंसी से सरकारी अस्पतालों में इस तरह की नकली दवाईओं की आपूर्ति की गई थी। राजनिवास के अनुसार कई रोगियों और बड़े पैमाने पर लोगों की शिकायतों के बाद इहबास, लोक नायक और दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल से नमूने एकत्र किए गए। ये तीनों अस्पतालों में लाखों रोगियों का उपचार चलता है।
राजनिवास के अनुसार, दिल्ली सरकार के अस्पतालों में आपूर्ति की जा रही नकली और गैर-मानक दवाओं में फेफड़ों और यूटी संक्रमण के इलाज के लिए उपयोग की जाने वाली महत्वपूर्ण जीवन रक्षक एंटीबायोटिक जिसमें सेफैलेक्सिन, फेफड़ों, जोड़ों और शरीर में सूजन को ठीक करने के लिए स्टेरॉयड डेक्सामेथासोन शामिल हैं। मिर्गी और मनोरोग की दवा लेवेतिरसेटम और उच्च रक्तचाप रोधी दवा एम्लोडेपिन शामिल है।
स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा वाली दवाईयां दी गईं
उपराज्यपाल ने दिल्ली के मुख्य सचिव को कार्रवाई करने को निर्देशित किया है। इस मामले में उपराज्यपाल ने कहा है कि बजटीय संसाधन खर्च करके खरीदी गई ये दवाएं सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है और लोगों के जीवन को खतरे में डालने की क्षमता रखती हैं। प्रथम दृष्टया, सीपीए-डीएचएस, जीएनसीटीडी के अलावा अन्य राज्यों में स्थित आपूर्तिकर्ता, निर्माता और उन राज्यों में ड्रग कंट्रोलर इस पूरे अभ्यास में जुड़े हुए हैं। यह कदम जब उठाया गया है जब दिल्ली सरकार के अस्पतालों में घटिया दवाओं की आपूर्ति के संबंध में मिली शिकायतों के आधार पर दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग के तहत ड्रग कंट्रोलर ने इन अस्पतालों से दवा के रैंडम नमूने एकत्रित किए। उन्हें मान्यताप्राप्त सरकारी और निजी प्रयोगशालाओं में भेजा गया था। मरीजों ने भी कहा था कि दवाएं बेअसर होती है।
अभी भी लंबित हैं 12 रिपोर्ट
उपराज्यपाल ने कहा है कि लैब की रिपोर्ट ड्रग कंट्रोलर और स्वास्थ्य विभाग द्वारा सतर्कता निदेशालय (डीओवी) को इस मामले में आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी गई थी। डीओवी ने परीक्षण रिपोर्टों के आधार पर पाया था कि 10 फीसदी से अधिक दवा और दवा के नमूने विफल हो गए। सतर्कता विभाग के अनुसार सरकारी प्रयोगशालाओं में भेजे गए 43 नमूनों में से तीन नमूने परीक्षण में विफल रहे। 12 रिपोर्ट अभी भी लंबित हैं। इसके अलावा, निजी प्रयोगशालाओं में भेजे गए अन्य 43 नमूनों में से पांच नमूने विफल रहे है।
सैंपलिंग का दायरा बढ़ाकर ऐसी दवाओं को बंद करना चाहिए
एम्लोडिपाइन, लेवेतिरसेटम और पैंटोप्राजोल जैसी दवाएं सरकारी और निजी दोनों लैब में फेल हो गईं। इसी तरह सेफैलेक्सिन, डेक्सामेथासोन निजी प्रयोगशालाओं में विफल रहे। 11 सैंपल की रिपोर्ट चंडीगढ़ की सरकारी लैब में पेंडिंग है। परीक्षण रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकलता है, जो दवाएं परीक्षण में विफल रही हैं वे मानक गुणवत्ता पर खरी नहीं उतरी है। विभाग को भी सैंपलिंग का दायरा बढ़ाकर ऐसी दवाओं का वितरण तुरंत बंद करना चाहिए। मकसद को जानने के लिए इस पूरे प्रकरण से पर्दा उठाने की जरूरत है।
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