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गुलमर्ग की 21 जनवरी और 30 जनवरी की तस्वीर
– फोटो : बासित जरगर
विस्तार
जम्मू कश्मीर में करीब दो माह का लंबा सूखे का दौर रहा। 26 जनवरी को मौसम में बदलाव हुआ। अल-निनो प्रभाव की वजह से ड्राई स्पेल (सूखा) लंबा खिंचने के कारण मौसम की बेरुखी का असर खेतों से पहाड़ों तक देखा जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में सीजनल बर्फबारी वाले पर्यटन स्थलों पर इस साल हिमपात नहीं होने के कारण दिसंबर और जनवरी में सामान्य से कई गुना कम पर्यटक पहुंचे हैं। इसका स्की, एडवेंचर सहित अन्य पर्यटन गतिविधियों पर भी असर पड़ा है।
सीजनल बर्फबारी से जुड़े होटल, टूर एंड ट्रैवल सहित अन्य स्थानीय कारोबार लगभग मंदा रहा है। वहीं, बारिश न होने के कारण प्रवेशद्वार लखनपुर से लेकर कश्मीर के आखिर तक सीजनल फसलें भी प्रभावित हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अगर फरवरी के पहले सप्ताह तक बारिश नहीं होती है, तो सरसों, गेहूं और मटर की पैदावार घटेगी।
कश्मीर के कृषि निदेशक इकबाल चौधरी के अनुसार लंबे समय बाद दिसंबर, 2023 से जनवरी, 2024 तक शुष्क मौसम देखा गया है। पहले अक्तूबर में भारी हिमपात के बाद थोड़े समय के लिए शुष्क मौसम रहता था। इससे सीजनल फसलों के लिए बारिश का पानी सिंचाई का काम कर देता था। इस मौसम में कश्मीर में सरसों, गेहूं और मटर की फसल लगाई जाती है। कश्मीर में 50 से 60 हजार हेक्टेयर भूमि पर मटर की खेती होती है। इसके लिए किसान अप्रैल से तैयारी शुरू कर देते हैं।
जून-जुलाई में जब देश के अन्य हिस्सों में मानसून के कारण सब्जियां खत्म हो जाती हैं तब कश्मीर बड़े पैमाने पर मटर का निर्यात करता है। अब अगर फरवरी में बर्फ पड़ती भी है तो वो अधिक देर तक नहीं जमेगी। इससे पानी भी नहीं ठहर पाएगा और इसका सीधा असर इन फसलों पर होगा। कश्मीर में रबी सीजन में 5 से 7 फरवरी तक बारिश होना जरूरी है। अगर लगातार बारिश होती है, तो उससे भी नर्सरी, रोपण, मक्की लगाने में देरी हो सकती है।
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