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Etawah Burning Train
– फोटो : अमर उजाला
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बस इतना समझ लीजिए कि मौत सामने थी और हम लोगों को छठ मइया ने बचा लिया। ट्रेन की बोगी जिस तरह से जल रही थी, अगर कुछ मिनट पहले बाहर नहीं निकले होते तो हड्डी की राख ही मिलती। ट्रेन अब कानपुर आ गई है, लेकिन अभी भी डर लग रहा है। बस किसी तरह घर पहुंच जाएं तो जाकर चैन मिलेगा।
देवरिया जिले के तरकुलवा के रहने वाले विजेंद्र भी उसी नई दिल्ली-दरभंगा क्लोन एक्सप्रेस में सवार थे, जिसमें इटावा में बुधवार की शाम को आग लगी थी। तरकुलवा में रहने वाले तरुण ने यात्रा कर रहे भाई विजेंद्र से टेलीफोन पर बात कराई।
विजेंद्र ने बताया कि वे जनरल कोच में थे। ट्रेन के स्टेशन पर रुकते ही आग लगने का शोर सुनकर सब डिब्बे से बाहर निकलने लगे। लोग एक दूसरे पर गिरते-पड़ते बाहर निकल रहे थे। मैं बीच में फंसा था, जहां से गेट तक आते-आते लगा कि अब नहीं निकल पाऊंगा। तब तक पीछे से भीड़ ने धक्का दिया और मैं प्लेटफार्म पर गिर पड़ा। उठकर फिर भागा कुछ दूर जाकर पलट कर देखा तो पीछे कोच से लपटें निकलने लगी थीं। मेरा बैग कोच में अंदर ही रह गया।
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