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प्रस्ताव शासन को भेजा
– फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
विस्तार
प्रदेश में 11,220 वन पंचायतों को और सशक्त बनाने की तैयारी है। इसके लिए उन्हें छोटे-मोटे वन अपराधों में वन दरोगा की तरह चालन काटने से लेकर वनोपज के संंबंध में निर्णय लेने जैसे अधिकार दिए जाएंगे।
इस संबंध में वन विभाग की ओर से प्रस्ताव तैयार कर शासन को सौंप दिया गया है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में होने वाली बैठक में इस पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा। प्रदेश में 453166.55 वर्ग किमी वन भूमि वन पंचायतों के अधीन है। जिसका पूरा रखरखाव वन पंचायतों से संबंधित प्रबंधन समितियां करती हैं। उत्तराखंड देश में अकेला ऐसा राज्य है, जहां वन पंचायतों का गठन किया गया है।
ब्रिटिशकाल में ही वर्ष 1815 उत्तर प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों (अब उत्तराखंड) में अंग्रेजों के शासन में यह व्यवस्था शुरू हुई थी। तब से लेकर उत्तराखंड राज्य गठन तक इसमें 14 बार महत्वपूर्ण बदलाव किए गए। अब उत्तराखंड गठन के बाद से इसमें तीसरी बार संशोधन की तैयारी है। इस संबंध में पूर्व में मुख्य सचिव डॉ. एसएस संधु की ओर से निर्देश जारी किए गए थे।
मुख्य वन संरक्षक, वन पंचायत एवं सामुदायिक वानिकी डॉ. पराग मधुकर धकाते ने बताया, उत्तराखंड पंचायती वन नियमावली 2012 में संशोधन के बाद प्रबंधन समितियां एक गवर्निंग बॉडी की तरह काम करेंगी। इसमें उन्हें छोटे वन अपराधों में चालान करने, वन क्षेत्र में कूड़ा-कचरा फेंकने में कार्रवाई, लीसा, शिलाजीत, कीड़ाजड़ी, चीड़ गुलिया और अन्य गैर प्रकाष्ठ वन उपज की बिक्री और प्रबंधन के अधिकार दिए जा सकते हैं। कई ऐसे मामले प्रबंधन समिति के सुपुर्द कर दिए जाएंगे, जिनके लिए अभी तक डीएफओ स्तर के अधिकारी की अनुमति लेनी पड़ती है।
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