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हल्द्वानी हिंसा को लापरवाही और बिन होश के जोश ने हिंसा दी। यही कारण रहा जिससे देवभूमि की संस्कृति में खून के छींटे पड़ गए। उत्तराखंड में कभी हिंसक घटनाओं का इतिहास नहीं रहा, लेकिन हल्द्वानी हिंसा देवभूमि के ललाट दाग पर लगा गई।
राज्य के कई इलाकों में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी रहती है, लेकिन वह यहां की संस्कृति में रच बस गए हैं। लोगों के घरों के निर्माण करने से लेकर मंदिरों तक की सजावट तक के हर काम में उनका सहयोग होता है। एक सुखद पहलु यह भी है कि भले ही लोग उन्हें रहीम, इकबाल, सुलेमान के नाम से पुकारते हो, लेकिन जब उनके मुख से स्थानीय बोली (गढ़वाली बोली) सुनते हैं तो यह बताता है कि वह किस तरह से यहां कि संस्कृति में घुल मिल गए हैं।
उत्तरकाशी सहित कुछ पहाड़ी जिले तो ऐसे हैं जहां कई मुस्लिम परिवारों की पीढ़ियां रही है। लेकिन अचानक इस राज्य की शांति ही भंग हो गई। किसने शांत फिजा का सुकून और खुशी छीन ली। सत्ता और विपक्ष भी इस घटना से हैरान है। क्योंकि देवभूमि में इस घटना की किसी ने कभी कल्पना नहीं की थी।
प्रदेश में पहली बार हिंसा की ऐसी तस्वीर सामने आने के बाद से हर उत्तराखंडवासी स्पब्ध है। सड़कों पर भयावह मंजर, पत्थरों की बारिश, आग की लपटें और गोलियों की आवाज से पूरे शहर की जनता ने भय को महसूस किया।
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