High Court : हत्या आरोपितों की फांसी की सजा रद्द, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सजा के खिलाफ अपील की मंजूर

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(सांकेतिक तस्वीर)

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– फोटो : सोशल मीडिया

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संदेह से परे अपराध साबित करने में अभियोजन पक्ष की नाकामी के कारण हत्या का दोषी करार देकर सत्र अदालत के अभियुक्तों की मौत की सजा रद कर दी है। फांसी की सजा की पुष्टि के लिए जिला अदालत मऊ द्वारा हाईकोर्ट को भेजा गया रिफरेंस निरस्त कर दिया है और तीनों सजायाफ्ता आरोपियों को अन्य केस में वांछित न होने की दशा में तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया है।

यह फैसला न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर तथा न्यायमूर्ति एन के श्रीवास्तव की खंडपीठ ने अकलू चौहान, जयचंद व राम सरन चौहान की आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए दिया है। अपर सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) मऊ ने मौत की सजा सहित 10 हजार जुर्माना लगाया था।

अपील पर अधिवक्ता जितेन्द्र कुमार पासवान ने बहस की। इनका कहना था कि 17 मार्च 2009 की शाम आरोपियों की बकरियां तुलसी गुप्ता के खेत में घुस कर फसल को भारी नुक़सान पहुंचाया। पत्थर फेंक कर हटाने के कारण बकरियां घायल हो गईं। उनमें से एक की मौत हो गई। दोनों में कुछ मुकद्दमेबाजी भी चल रही थी।आरोप है कि नाराज आरोपियों ने खेत में लगी ट्यूबवेल पर सो रहे राम सनेही व पब्बर मौर्य की गोली मारकर हत्या कर दी। घातक हथियारों से भी हमला किया। सुबह दोनों की लाश खेत में पायी गई।

पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और सत्र अदालत ने आरोपियों को हत्या का दोषी ठहराया और मौत की सजा सुना दी। हाईकोर्ट ने कहा कि चश्मदीद गवाह अपने बयान से मुकर गया था। आरोपियों के खिलाफ हत्या में लिप्त होने का कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है। एफ एसएल रिपोर्ट नहीं है। हत्या में उपयुक्त हथियार की बरामदगी नहीं की गई है। परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी नहीं है।

कोर्ट ने कहा आरोपियों को संदेह का लाभ पाने का अधिकार है। दी गई सजा निरस्त होने योग्य है। कोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के फैसले को रद्द कर दिया तथा फांसी के रिफरेंस को निरस्त कर दिया है और सजा के खिलाफ  अपीलों को संदेह का लाभ देते हुए स्वीकार कर ली है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संदेह से परे अपराध साबित करने में अभियोजन पक्ष की नाकामी के कारण हत्या का दोषी करार देकर सत्र अदालत के अभियुक्तों की मौत की सजा रद कर दी है। फांसी की सजा की पुष्टि के लिए जिला अदालत मऊ द्वारा हाईकोर्ट को भेजा गया रिफरेंस निरस्त कर दिया है और तीनों सजायाफ्ता आरोपियों को अन्य केस में वांछित न होने की दशा में तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया है।

यह फैसला न्यायमूर्ति प्रीतिंकर दिवाकर तथा न्यायमूर्ति एन के श्रीवास्तव की खंडपीठ ने अकलू चौहान, जयचंद व राम सरन चौहान की आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए दिया है। अपर सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) मऊ ने मौत की सजा सहित 10 हजार जुर्माना लगाया था।

अपील पर अधिवक्ता जितेन्द्र कुमार पासवान ने बहस की। इनका कहना था कि 17 मार्च 2009 की शाम आरोपियों की बकरियां तुलसी गुप्ता के खेत में घुस कर फसल को भारी नुक़सान पहुंचाया। पत्थर फेंक कर हटाने के कारण बकरियां घायल हो गईं। उनमें से एक की मौत हो गई। दोनों में कुछ मुकद्दमेबाजी भी चल रही थी।आरोप है कि नाराज आरोपियों ने खेत में लगी ट्यूबवेल पर सो रहे राम सनेही व पब्बर मौर्य की गोली मारकर हत्या कर दी। घातक हथियारों से भी हमला किया। सुबह दोनों की लाश खेत में पायी गई।

पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और सत्र अदालत ने आरोपियों को हत्या का दोषी ठहराया और मौत की सजा सुना दी। हाईकोर्ट ने कहा कि चश्मदीद गवाह अपने बयान से मुकर गया था। आरोपियों के खिलाफ हत्या में लिप्त होने का कोई विश्वसनीय सबूत नहीं है। एफ एसएल रिपोर्ट नहीं है। हत्या में उपयुक्त हथियार की बरामदगी नहीं की गई है। परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी नहीं है।

कोर्ट ने कहा आरोपियों को संदेह का लाभ पाने का अधिकार है। दी गई सजा निरस्त होने योग्य है। कोर्ट ने अधीनस्थ अदालत के फैसले को रद्द कर दिया तथा फांसी के रिफरेंस को निरस्त कर दिया है और सजा के खिलाफ  अपीलों को संदेह का लाभ देते हुए स्वीकार कर ली है।



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