Himachal: बैकडोर एंट्री से सार्वजनिक रोजगार प्राप्त करना असांविधानिक, हाईकोर्ट ने दी अहम व्यवस्था

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HP High Court: Unconstitutional to get public employment through backdoor entry

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
– फोटो : अमर उजाला

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सार्वजनिक रोजगार से जुड़े मामले में अहम व्यवस्था दी है। अदालत ने कहा कि पिछले दरवाजे (बैकडोर एंट्री) से सार्वजनिक रोजगार प्राप्त करना संविधान के प्रावधानों के विपरीत है। जो लोग बैकडोर एंट्री का इस्तेमाल करते हैं वे संविधान के अनुछेद 14 और 16 के तहत समानता का लाभ लेने के हकदार नहीं हैं। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने परिचालकों की 185 याचिकाओं को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। परिचालक सतीश कुमार और अन्यों ने अदालत के समक्ष अलग-अलग 185 याचिकाएं दायर की थीं।

अदालत को बताया गया था कि इन्होंने यात्री सेवा वितरण कौशल विकास कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण लिया था। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद इन्हें परिचालक के पद पर तैनात किया गया। तीन साल के बाद इनकी सेवाओं को बिना नोटिस के समाप्त कर दिया गया। कुछ प्रशिक्षुओं ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल से अंतरिम आदेश प्राप्त किए और अभी तक परिचालक के पद पर तैनात हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से गुहार लगाई थी कि नियमितिकरण के लिए सरकार को पॉलिसी बनाने के आदेश दिए जाएं। एचआरटीसी की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता परिचालकों के पद पर नियमितिकरण का हक नहीं रखते हैं।

इन्हें यात्री सेवा वितरण कौशल विकास कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षण दिया गया था। अदालत के अंतरिम आदेशों के तहत वे अभी तक परिचालक के तौर पर सेवाएं दे रहें हैं। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने निर्णय में कहा कि एचआरटीसी एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है और सभी संवर्गों का रोजगार आवश्यक रूप से सार्वजनिक रोजगार में आता है। सार्वजनिक क्षेत्र में सभी पात्र व्यक्तियों को समान अवसर दिए बिना नियुक्ति देना संविधान के प्रावधानों के विपरीत है।

मामले से जुड़े रिकॉर्ड के बाद अदालत ने पाया कि एचआरटीसी ने याचिकाकर्ताओं को किसी भी रोजगार या पद की पेशकश नहीं की थी। याचिकाकर्ताओं के पास न तो कोई नियुक्ति पत्र है और न ही कोई नियुक्ति की शर्तें। याचिकाकर्ताओं को केवल स्टॉप-गैप व्यवस्था के रूप में नियुक्त किया गया था। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को इसका कोई अधिकार नहीं है कि उनकी सेवाओं को जारी रखा जाए। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ताओं ने पिछले दरवाजे से प्रवेश सुनिश्चित किया है, इस आधार पर संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत वे समानता का अधिकार पाने के हकदार नहीं हैं।

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