Hindi Diwas 2023: नागरी प्रचारिणी सभा…. हिंदी को अलग पहचान दिलाने वाले गढ़ को आखिर लोग भूल क्यों गए?

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Hindi Diwas 2023 Nagari Pracharini Sabha Why did people forget distinct identity  of varanasi

नागरी प्रचारिणी सभा
– फोटो : अमर उजाला

विस्तार


हिंदी को अलग पहचान दिलाने वाले गढ़ वाराणसी स्थित नागरी प्रचारिणी सभा को नई पीढ़ी नहीं जानती। अलबत्ता साहित्य के छात्र अपनी पाठ्य-पुस्तकों में 130 साल पुरानी इस संस्था और इसके तीन संस्थापकों का नाम पढ़कर याद भर कर लेते हैं। बहुविकल्पीय प्रश्नों वाली परीक्षाओं में इतनी-सी जानकारी से काम भी चल जाता है। लेकिन, लोग नागरी प्रचारिणी सभा को भूल क्यों गए? जवाब आसान है। इसमें लोगों का दोष नहीं है। जो काम नहीं करता, उसे लोग भूल जाते हैं और जो लगातार काम करता है, उसे याद रखा जाता है। अगर समाज भुलक्कड़ या कृतघ्न होता तो वह नागरी प्रचारिणी सभा की तरह गीता प्रेस, गोरखपुर को भी भुला देता। ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि गीता प्रेस ने अपना काम कभी बंद नहीं किया।

2023 में उस संस्था की स्थापना के सौ बरस पूरे हुए। इस अवसर पर भारत सरकार ने गीता प्रेस को गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया। यह आत्मविश्वास गीता प्रेस ने अपने काम से अर्जित किया है। हिंदू धर्म और संस्कृति के विश्वव्यापी उत्थान में गीता प्रेस की भूमिका वैसी ही है, जैसी हिंदी भाषा और साहित्य के उन्नयन में नागरी प्रचारिणी सभा की। लेकिन, सभा का काम अतीत हो गया और गीता प्रेस की मेहनत भविष्य के द्वार पर दस्तक दे रही है।गीता प्रेस से

ज्यादा पुराना नागरी प्रचारिणी सभा

नागरी प्रचारिणी सभा की उम्र गीता प्रेस से 30 वर्ष ज्यादा है। सभा को तीस साल आगे का काम करके दिखाना था, लेकिन वह साठ साल पीछे 1963 में ही थम गई। 1963 के बाद हिंदी की इस संस्था में कोई यादगार काम नहीं हुआ। उसके दरवाजे हिंदी के सर्वोत्तम कवियों-लेखकों के लिए बंद हो गए। गजानन माधव मुक्तिबोध को सभा में नौकरी नहीं मिली। त्रिलोचन बहुत मामूली तनख्वाह पर अपमान सहते हुए सभा के पुस्तकालय और शब्दसागर की परियोजना में नौकरी करते रहे। लेकिन इस महान संस्था के शुरुआती वर्ष बहुत गौरवशाली थे। 

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