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महिलाओं ने कहा कि पूरी दुनिया में रंगों की होली होती है लेकिन काशी में दिल मिलाने की होली खेली जाती है और नफरत की होलिका जलाई जाती है। तभी तो भूत भावन महादेव श्मशान में चिता की भस्म से होली खेलते हैं। हमारे पूर्वजों के खून में होली के रंगों की लालिमा है। नीचे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें…
लमही के इंद्रेश नगर स्थित सुभाष भवन में विशाल भारत संस्थान एवं मुस्लिम महिला फाउंडेशन के संयुक्त तत्वाधान में रविवार को ‘गुलाबों और गुलालों वाली होली’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान महिलाओं ने एक दूसरे पर गुलाब और गुलाल की वर्षा कर बधाई दी।
देश को बांटने वाले और आतंकियों को मुस्लिम महिलाओं ने करारा जबाव दिया कि उनके कहने पर कोई अलग होने वाला नहीं। होली का त्योहार मोहब्बत और एकता का त्योहार है। यह किसी भेद को नहीं मानता। भारतीयों के लिए यह त्योहार संबंधों में अमृत की तरह है। धर्म के ठेकेदार भारतीय त्योहारों को धर्म में न बांटे।
चेहरों पर गुलाल और एक दूसरे के मुंह में लड्डू खिलाती महिलाएं खूबसूरत भारत की तस्वीर पेश कर रही थीं। पूरा सुभाष भवन होली के रंग में रंगा नजर आया। मुस्लिम महिलाओं ने सुभाष मंदिर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा पर गुलाल लगाकर होली की शुरुआत की।
मुस्लिम महिला फाउंडेशन की नेशनल सदर नाजनीन अंसारी ने कहा कि हमने मजहब बदल लिया लेकिन संस्कृति नहीं बदली और न ही पूर्वज बदले। हमारे खून में शामिल है पूर्वजों के होली का रंग। जब ईद में हिंदू भाई गले मिलते हैं और रोजा इफ्तार करवाते हैं, तो मुसलमानों को भी होली मिलन समारोह का आयोजन करना चाहिए।
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