हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भू अधिग्रहण से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सभी विस्थापितों के साथ सजातीय वर्ग मानते हुए समान व्यवहार नहीं किया जा सकता। यदि श्रेणीवार प्राथमिकता नहीं दी जाती है तो उत्तरदाताओं की कार्रवाई मनमानी मानी जाती है। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने यह निर्णय सुनाया। मामले के अनुसार 26 फरवरी 2000 को एनटीपीसी ने हिमाचल सरकार के साथ एक अनुबंध (एमओयू) हस्ताक्षरित किया था। इसके तहत एनटीपीसी ने विस्थापित लोगों के पुनर्वास और पुनरुत्थान के लिए सरकार के साथ मिलकर कल्याणकारी स्कीम बनाई थी। विस्थापितों के पुनर्वास के लिए कंपनी ने ढुलाई का काम आवंटित किया। इसके लिए निविदाएं आमंत्रित की गई और 30 मार्च 2022 को एनटीपीसी ने 30 विस्थापित परिवारों की सूची जारी की। कंपनी की ओर से जारी चयनित सूची को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट में मामले के लंबित रहने के दौरान एनटीपीसी ने टेंडर प्रक्रिया को ही रद्द कर दिया। उसके बाद एनटीपीसी ने दोबारा से निविदाएं आमंत्रित की और इस बार विस्थापित परिवारों की श्रेणी बनाकर सूची तैयार की गई। याचिकाकर्ता भुवनेश कुमार ने विस्थापित परिवारों को श्रेणी में बांटने पर हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि हालांकि, अनुबंध के मामलों में हाईकोर्ट की ओर से कम से कम दखल अंदाजी की जा सकती है, लेकिन कंपनी की ओर से ढुलाई के काम के लिए विस्थापित परिवारों को श्रेणी में बांटा जाना न्यायोचित है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि विस्थापित परिवारों को पुनरुत्थान के लिए श्रेणी में बांटा जाना उचित है। यह देखना आवश्यक है कि विस्थापित परिवारों में से किस विस्थापित को सबसे पहले स्थापित करने की आवश्यकता रहती है।
प्रदेश हाईकोर्ट ने चयन प्रक्रिया में सफल उम्मीदवार को नियुक्ति न देने पर कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने उपायुक्त शिमला के उस निर्णय को निरस्त कर दिया जिसके तहत चयन प्रक्रिया को रद्द कर दिया गया था। अदालत ने चयन कमेटी को आदेश दिए कि वह चयन प्रक्रिया की दोबारा से मेरिट बनाएं और याचिकाकर्ता को 12 मार्च 2012 से नियुक्ति दे। मामले के अनुसार कार्यकारी अधिकारी पंचायत समिति ठियोग ने 16 जून 2011 को पंचायत सहायक के पद के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। याचिकाकर्ता ने इस चयन प्रक्रिया में भाग लिया और चयन कमेटी ने 12 मार्च 2012 को उसे इस पद के लिए योग्य घोषित किया, लेकिन अगले ही दिन 13 मार्च 2012 को उसका नाम चयन सूची से हटा दिया गया।
याचिकाकर्ता ने सूचना के अधिकार से प्राप्त सूचना से पाया गया कि उसकी जगह किसी दूसरे उम्मीदवार का चयन किया गया और याचिकाकर्ता को बीसीए योग्यता के नंबर नहीं दिए गए। याचिकाकर्ता ने इसकी शिकायत पंचायती राज निदेशक के पास की। निदेशक ने खंड विकास अधिकारी ठियोग को मामला भेजते हुए यह स्पष्ट किया था कि याचिकाकर्ता को बीसीए योग्यता के लिए नंबर आवंटित किए जाए। खंड विकास अधिकारी ने मामले को चयन कमेटी के पास भेज दिया और उसे बीसीए की योग्यता के नंबर दिए जाने के निर्देश दिए गए। याचिकाकर्ता को उसके बाद भी जब नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया तो उसने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के समक्ष याचिका दायर की। ट्रिब्यूनल ने उपायुक्त शिमला को आदेश दिए थे याचिकाकर्ता को सुनवाई का मौका देकर इस मामले का निपटारा किया जाए। उपायुक्त शिमला ने याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन को खारिज करते हुए दोबारा चयन प्रक्रिया करने के आदेश जारी किए थे, जिसे हाईकोर्ट ने रद्द करते हुए यह निर्णय सुनाया।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भू अधिग्रहण से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सभी विस्थापितों के साथ सजातीय वर्ग मानते हुए समान व्यवहार नहीं किया जा सकता। यदि श्रेणीवार प्राथमिकता नहीं दी जाती है तो उत्तरदाताओं की कार्रवाई मनमानी मानी जाती है। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने यह निर्णय सुनाया। मामले के अनुसार 26 फरवरी 2000 को एनटीपीसी ने हिमाचल सरकार के साथ एक अनुबंध (एमओयू) हस्ताक्षरित किया था। इसके तहत एनटीपीसी ने विस्थापित लोगों के पुनर्वास और पुनरुत्थान के लिए सरकार के साथ मिलकर कल्याणकारी स्कीम बनाई थी। विस्थापितों के पुनर्वास के लिए कंपनी ने ढुलाई का काम आवंटित किया। इसके लिए निविदाएं आमंत्रित की गई और 30 मार्च 2022 को एनटीपीसी ने 30 विस्थापित परिवारों की सूची जारी की। कंपनी की ओर से जारी चयनित सूची को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट में मामले के लंबित रहने के दौरान एनटीपीसी ने टेंडर प्रक्रिया को ही रद्द कर दिया। उसके बाद एनटीपीसी ने दोबारा से निविदाएं आमंत्रित की और इस बार विस्थापित परिवारों की श्रेणी बनाकर सूची तैयार की गई। याचिकाकर्ता भुवनेश कुमार ने विस्थापित परिवारों को श्रेणी में बांटने पर हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि हालांकि, अनुबंध के मामलों में हाईकोर्ट की ओर से कम से कम दखल अंदाजी की जा सकती है, लेकिन कंपनी की ओर से ढुलाई के काम के लिए विस्थापित परिवारों को श्रेणी में बांटा जाना न्यायोचित है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि विस्थापित परिवारों को पुनरुत्थान के लिए श्रेणी में बांटा जाना उचित है। यह देखना आवश्यक है कि विस्थापित परिवारों में से किस विस्थापित को सबसे पहले स्थापित करने की आवश्यकता रहती है।