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‘हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा’… बशीर बद्र का यह शेर कलमकार लक्ष्मण राव के जीवन की कहानी पर सटीक बैठता है। कभी मिल में मजदूरी, कभी किसानी तो कभी होटलों में बर्तन धोकर चाय की दुकान चलाने तक के 50 साल के इस सफर में उन्होंने साहित्यकार बनने के सपने को नहीं छोड़ा। इस जुनून का ही नतीजा है कि अभी तक वह 25 किताबें लिख चुके हैं।
लक्ष्मण राव का सफर काफी दिलचस्प है। दिल्ली में इनको पहचान फुटपाथ की चाय की दुकान से मिली। आईटीओ स्थित हिंदी भवन के नजदीक वह दुकान पर चाय के साथ पुस्तकें भी रखते थे। 10 रुपये वाली कड़क चाय के साथ लोग उनके साहित्य से भी रूबरू होते थे। कोविड काल में दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल के अधिकारी ने मिलने के लिए बुलाया और अपने यहां चाय के स्टॉल में नौकरी की पेशकश की। अब यह वहीं जम गए हैं। वह चाय के साथ यहां अपनी पुस्तकें भी प्रदर्शित करते हैं। बनाने को तो वह आज भी चाय ही बना रहे हैं, लेकिन आज वह चाय दस रुपये के बजाय 778 रुपये की होती है।
गुलशन नंदा से प्रभावित होकर शुरू किया लेखन
महाराष्ट्र के अमरावती में जन्मे 70 वर्षीय लक्ष्मण राव बताते हैं कि बचपन में गुलशन नंदा की लेखनी से प्रभावित होकर उनके मन में भी लेखक बनने की इच्छा हुई। गांव में रामदास नाम के बच्चे की नदी में डूबने से मौत हुई तो उन्होंने इस पर लिखने की ठानी और उसी बच्चे के नाम पर पहला उपन्यास लिख दिया। 10वीं पास करने के बाद 1973 में उन्होंने अमरावती की सूत मिल में काम किया। मिल बंद हुई तो वह गांव में ही खेतों में काम करने लगे। हालांकि इस दौरान उन्होंने पढ़ना-लिखना नहीं छोड़ा। 1975 में वह दिल्ली आ गए। पहले दो साल होटलों में बर्तन धोने में बीत गए। काफी मशक्कत के बाद 1979 में उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई। 1993 में उन्होंने हिंदी भवन के फुटपाथ पर पान मसाले की दुकान खोली। कुछ समय बाद चाय भी बनाने लगे।
इंदिरा गांधी ने किया था लिखने का अनुरोध
मई 1984 में लक्ष्मण राव तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिले और उन्होंने पीएम के जीवन पर पुस्तक लिखने की इच्छा जाहिर की। तब इंदिरा गांधी ने उन्हें ‘पीएम कार्यकाल’ पर लिखने का सुझाव दिया। इस पर लक्ष्मण ने प्रधानमंत्री नाम से एक नाटक लिखा। 2009 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मुलाकात का अवसर मिला। उन्होंने राष्ट्रपति को अपनी पुस्तक ‘रेणु’ भेंट की।
64 साल में किया परास्नातक
लक्ष्मण कहते हैं, जब उन्होंने लिखना शुरू किया तो वह महज 10वीं पास थे। धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि पढ़ाई जरूरी है। उन्होंने 40 साल की उम्र में 12वीं, 50 साल की उम्र में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और उम्र के 64वें पड़ाव में इग्नू से परास्नातक किया।
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