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कश्मीर फाइल्स की स्क्रीनिंग
– फोटो : अमर उजाला
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जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय कैंपस में बृहस्पतिवार को साबरमती ढाबा के सामने कश्मीर फाइल्स की स्क्रीनिंग की गई। इस दौरान घाटी में 1990 के नरसंहार में जान गंवाने वाले परिवारों के सदस्यों ने छात्रों को आपबीती सुनाई। कैंपस में नरसंहार को दर्शाते पुतलों से घटना पर विरोध जताया गया। जेएनयू एबीवीपी की ओर से घाटी में 19 जनवरी 1990 को हुए नरसंहार के विरोध में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। सबसे पहले कश्मीरी पंडितों पर हुए नरसंहार को पुतलों से दर्शाया गया, इसमें दिखाया गया कि उस दिन आतंकवादियों ने बुजुर्ग, महिला, बच्चों किसी को भी नहीं छोड़ा था।
चारों ओर सिर्फ चीख-पुकार और बाद में खामोशी थी। कश्मीरी पंडित कैसे अपनी जान बचाने के लिए घर, सामान, पैसा, कपड़े सबकुछ छोड़कर भागे थे। 30 साल बीतने के बाद भी वे अपने घरों से दूर हैं। इस दौरान जेएनयू में पहुंचे कई परिवारों ने नरसंहार का आंखों देखा हाल छात्रों को सुनाया।
अपनी ही मातृभूमि से निकालने का दर्द नहीं भूलते: कमल
जेएनयू की सहायक प्रोफेसर आयुषी केतकर ने परिचर्चा में इस घटना को लेकर अपनी बात रखी। पानून कश्मीर के राष्ट्रीय प्रवक्ता कमल हाक ने कहा कि वर्षों बीतने के बाद भी वे अपनी मातृभूमि और जन्मभूमि से दूर हैं। उन्हें जबरदस्ती कैसे निकाल बाहर किया था। वहीं, यूथ फॉर पानून कश्मीर के सचिव विथल चौधरी ने बताया कि उनके सामने कई पंडितों को मौत के घाट उतार दिया गया पर वे कोई मदद नहीं कर सकते थे।
रूटस इन कश्मीर के प्रवक्ता अमित रैना ने बताया कि सात बार अपने ही घर से पंडितों को निष्कासित किया गया। साल 1989 में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी ने शुरुआत की। इसके बाद कश्मीर में इस्लामिक ड्रेस कोड लागू कर दिया गया और पंडितों को घाटी छोड़नी पड़ी।
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